
राम मंदिर निधि घोटाले के आरोपों से आस्था के राजनीतिकरण का वास्तविक मकसद उजागर
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रबंधन में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। लगभग 5000 करोड़ रुपये के कथित दुरुपयोग, दान संग्रह से प्राप्त नकदी, आभूषणों एवं अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के गायब होने संबंधी रिपोर्टों तथा वर्तमान में चल रही विशेष जांच दल की जांच निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग करती है। सौ से अधिक व्यक्तियों से पूछताछ तथा लगभग 2 करोड़ रुपये की नकदी और स्वर्ण आभूषणों की कथित बरामदगी से निगरानी और प्रशासनिक उत्तरदायित्व को लेकर गंभीर चिंताएँ सामने आती हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा आस्था के नाम पर दिए गए योगदान का प्रबंधन पूर्ण पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ किया जाना चाहिए।
इस विवाद को धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक उपयोग, सत्ता प्राप्ति और वित्तीय हितों के व्यापक संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। राम मंदिर मुद्दे के इर्द-गिर्द चलाए गए राजनीतिक अभियान ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया तथा वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस जैसी घटना को जन्म दिया, जिसने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों, संवैधानिक सिद्धांतों और विधि के शासन को गंभीर चुनौती दी। यह पूरा प्रकरण उन सभी सच्चे आस्थावानों के लिए एक चेतावनी और आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए, जो यह समझना चाहते हैं कि किस प्रकार धार्मिक आस्था का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। लोकतंत्र में राजनीतिक हितों से ऊपर जवाबदेही, पारदर्शिता और न्याय का स्थान होना चाहिए।
सीताराम खोईवाल
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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