न्यायिक नियुक्तियों में विविधता और शामिलियत का अभाव आज हिंदुस्तान की उच्च न्यायपालिका के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों और दूसरे ऐतिहासिक रूप से वंचित तबकों की उच्च न्यायपालिका में नुमाइंदगी आज भी नाकाफी है। हिंदुस्तान की सामाजिक विविधता की नुमाइंदगी करने वाली न्यायपालिका ही संविधान के तहत समान न्याय के वादे पर जनता का भरोसा मजबूत कर सकती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता भी उतनी ही ज़रूरी है। यह यकीनी बनाया जाना चाहिए कि न्यायिक नियुक्तियां योग्यता, संवैधानिक मूल्यों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के आधार पर हों, न कि किसी खास विचारधारा के आधार पर।

तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पर संसद में हुई बहस के दौरान जिन मुद्दों को मजबूती से उठाया, उन्होंने इन बुनियादी सवालों को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ा देना भर न्यायपालिका के सामने मौजूद गहरी चुनौतियों का समाधान नहीं है। उच्च न्यायालयों में लगातार रिक्तियां, लंबित मामलों का बढ़ता बोझ, न्याय मिलने में देरी और व्यापक न्यायिक सुधारों का अभाव तत्काल ध्यान देने की मांग करता है। सार्थक सुधार केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि ऐसी न्यायिक व्यवस्था के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए जो ज़्यादा नुमाइंदगी वाली, पारदर्शी, जवाबदेह और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हो।

आतिका साजिद
राष्ट्रीय सचिव
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया