
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का अभूतपूर्व पलायन भारतीय लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। सांसदों और विधायकों द्वारा जिस तेजी से अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को त्यागा गया है, वह केवल किसी दल के संकट का संकेत नहीं है, बल्कि केंद्र की सत्ताधारी व्यवस्था द्वारा डाले जा रहे भारी राजनीतिक दबाव, प्रलोभनों और प्रभाव के सामने लोकतांत्रिक प्रतिनिधियों के मनोबल टूटने को भी दर्शाता है।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि अनेक राजनीतिक शक्तियां अल्पकालिक राजनीतिक अस्तित्व के लिए सांप्रदायिक राजनीति के बढ़ते खतरे को नजरअंदाज करने को तैयार हैं। सरकारी एजेंसियों की शक्ति, वित्तीय संसाधनों और राजनीतिक संरक्षण के बल पर भाजपा का बढ़ता प्रभाव लोकतांत्रिक परिदृश्य को इस प्रकार बदल रहा है, जिससे वास्तविक विपक्षी राजनीति कमजोर हो रही है। जब धनबल और सत्ता का प्रभाव राजनीतिक निष्ठाओं तथा जनादेश को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक बन जाएं, तब लोकतंत्र फल-फूल नहीं सकता।
तैय्यदुल इस्लाम
राष्ट्रीय सचिव
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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