आर्थिक मोर्चे से चिंताजनक संकेत

भारतीय अर्थव्यवस्था से चिंताजनक संकेत मिल रहे हैं, जिन्हें प्रशासन और नीति-निर्माताओं को गंभीरता से लेना चाहिए, वरना आने वाले दिनों में कोई बड़ा और अप्रत्याशित आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।

अधिकतर राष्ट्रीय अख़बारों और टीवी चैनलों ने जुलाई से सितंबर तक 2025-26 की दूसरी तिमाही में 8.2% GDP वृद्धि को ज़ोर-शोर से पेश किया। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की बड़ी उपलब्धि बताया गया। लेकिन सच यह है कि यह वृद्धि दर एक अपवाद है, जबकि समग्र अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन काफ़ी कमजोर है।

कॉरपोरेट जगत, खासकर गुजरात के कुछ बड़े व्यवसायी, पिछले दशक में अच्छा मुनाफ़ा कमाते रहे हैं। इनमे से कई लोग प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी के बेहद क़रीबी माने जाते हैं और चुनावी फंडिंग से लेकर सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने वाले अभियानों में भी भूमिका निभाते हैं।

लेकिन आम लोगों की ज़िंदगी—खासकर किसानों और मज़दूरों की—कुछ और ही कहानी बयां करती है। अधिकतर आर्थिक संकेत बताते हैं कि छोटे और मझोले किसान मुश्किल में हैं। खेती से मिलने वाली आमदनी घट रही है, क्योंकि आयात बढ़ रहा है और खेती का ख़र्च लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार द्वारा लाए गए चार कृषि कानून, जो खेती को पूरी तरह कॉरपोरेट के हवाले कर देते, किसानों के बड़े आंदोलन के बाद वापस लेने पड़े। लेकिन किसानों की बदहाली अब भी जारी है। किसान आत्महत्याओं की खबरें आती रहती हैं, मगर अधिकतर मीडिया इन्हें नज़रअंदाज़ कर देता है।

इसी तरह, मज़दूर वर्ग भी नए श्रम संहिता के खिलाफ़ आक्रोश में है। ये चार नए श्रम कानून पिछले 70 सालों में बने मज़दूर सुरक्षा कानूनों को खत्म कर देंगे। न्यूनतम मज़दूरी, 8 घंटे की ड्यूटी, बोनस, भत्ते—सब कुछ कमजोर हो जाएगा। ‘हायर एंड फायर’ आम हो जाएगा। इससे संगठित क्षेत्र के मज़दूरों को भारी चोट लगेगी, जबकि असंगठित क्षेत्र और गिग वर्कर्स के पास तो वैसे भी कोई सुरक्षा नहीं है।

सरकार लगातार मीडिया प्रचार और आंकड़ों की हेराफेरी के ज़रिए हालात को बेहतर दिखाने की कोशिश कर रही है। आर्थिक आंकड़े इकट्ठा करने की उसकी प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। IMF ने भी भारत के राष्ट्रीय लेखा-जोखा सिस्टम को ‘ग्रेड C’ पर रखा है, जो बेहद चिंताजनक है। किसी भी देश की आर्थिक विश्वसनीयता और निवेश आकर्षित करने की क्षमता सही आंकड़ों पर ही टिकी होती है।

इसलिए सरकार की दिखाई जा रही “चमकती अर्थव्यवस्था” की कहानी भरोसेमंद नहीं है। अगर समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो गंभीर आर्थिक संकट उभर सकता है। देश को बचाने का एक ही रास्ता है—कॉरपोरेट हितों को नहीं, बल्कि आम लोगों को बेहतर सहारा देना। क्योंकि अर्थव्यवस्था को ताकत आम जनता की मेहनत और उसकी खपत देती है, न कि विदेशों में अकूत संपत्ति जमा करने वाले चंद पूंजीपति।

मोहम्मद इलियास थुम्बे
राष्ट्रीय महासचिव