बंगाली प्रवासी मज़दूरों का उत्पीड़न बंद हो

देश के विभिन्न राज्यों—जिनमें अधिकांश पर भाजपा या उसके सहयोगी दलों का शासन है—से प्राप्त रिपोर्टें अत्यंत चिंताजनक हैं। इन रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि बंगाल के ग़रीब प्रवासी मज़दूरों को पुलिस एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा परेशान किया जा रहा है, जबकि वे भारतीय नागरिक हैं और उन्हें भारत के किसी भी हिस्से में आने-जाने और काम करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।

मीडिया रिपोर्टों और हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल सरकार के आधिकारिक बयानों के अनुसार, असम, ओडिशा, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में प्रवासी बंगाली मज़दूरों—जिनमें अधिकतर दिहाड़ी मज़दूर, रिक्शा चालक और घरेलू कामगार शामिल हैं—के उत्पीड़न और गिरफ़्तारी की घटनाएं सामने आई हैं। यह सभी राज्य भाजपा या उसकी सहयोगी पार्टियों के शासन में हैं। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति यह दर्शाती है कि इन मज़दूरों को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है, विशेषकर इसलिए क्योंकि इन मज़दूरों में अधिकांश आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय से आते हैं, जिन्हें रोज़गार की तलाश में अन्य राज्यों का रुख करना पड़ता है।

यह भी सामने आया है कि इन मज़दूरों के पास आधार कार्ड और अन्य वैध दस्तावेज़ होते हुए भी, स्थानीय पुलिस केवल उनकी भाषा—बंगाली—के आधार पर उन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया बताकर परेशान करती है और गिरफ़्तार कर लेती है।

हाल ही में पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव श्री मनोज पंत ने ओडिशा के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये मज़दूर इसलिए हमलों का शिकार हो रहे हैं क्योंकि वे “बंगाली बोलते हैं, जो उनकी मातृभाषा है।” उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में इन नागरिकों को केवल भाषाई समानता के आधार पर ग़लत तरीके से बांग्लादेशी बताकर प्रताड़ित किया गया। इस विषय को लेकर न केवल राज्य के मुख्य सचिव अन्य राज्यों से संवाद कर रहे हैं, बल्कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में एक रैली निकालकर अन्य राज्यों में बंगाली प्रवासी मज़दूरों पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ विरोध भी दर्ज कराया।

यह एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। बंगाल के ये मज़दूर अपने गांवों में ग़रीबी और रोज़गार की कमी के कारण पलायन को विवश हैं। वे उन राज्यों में श्रम कर रहे हैं जहां स्थानीय लोग कम वेतन या सामाजिक स्थिति के कारण यह कार्य नहीं करना चाहते। ऐसे में ये प्रवासी श्रमिक मेज़बान राज्यों की अर्थव्यवस्था को मज़बूती देते हैं और राष्ट्रीय आर्थिक विकास में भी योगदान करते हैं। भाजपा और उसके सहयोगियों की संकीर्ण क्षेत्रीय और सांप्रदायिक सोच न केवल इन श्रमिकों के लिए बाधा बन रही है, बल्कि यह देश की आर्थिक प्रगति को भी अवरुद्ध कर रही है।

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करती है कि वे तत्काल प्रभाव से इस प्रकार के भेदभावपूर्ण और अमानवीय उत्पीड़न को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं। यह भी स्मरणीय है कि इस प्रकार की अवैध और असंवैधानिक गतिविधियां—जिनमें पुलिस और सत्तारूढ़ दलों की संलिप्तता है—हमारे राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं।

इलियास मुहम्मद थुम्बे
राष्ट्रीय महासचिव