
सालों की लड़ाई के बाद इंसाफ: तबलीगी मामले में सांप्रदायिक पक्षपात पर जीत
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय महासचिव यासमीन फारूकी ने दिल्ली हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया है, जिसमें तबलीगी जमात के 70 सदस्यों के खिलाफ दर्ज 16 एफआईआर और चार्जशीट को रद्द कर दिया गया है। यह फैसला उस सांप्रदायिक नैरेटिव को कड़ी फटकार देता है, जिसने कोविड-19 महामारी के दौरान मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया और एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को राजनीतिक लाभ के लिए भुनाया।
मार्च 2020 में निज़ामुद्दीन मरकज़ में तबलीगी जमात के कार्यक्रम को “सुपर-स्प्रेडर” कहा गया, जबकि यह आयोजन देशव्यापी लॉकडाउन से पहले हुआ था। इस पर लगाए गए आरोप—आपराधिक साजिश से लेकर लॉकडाउन के नियमों के उल्लंघन तक—किसी विश्वसनीय साक्ष्य पर आधारित नहीं थे। इसके बाद मीडिया और राजनीतिक हलकों में एक सुनियोजित अभियान चलाया गया, जिसमें तबलीगी सदस्यों को “कोरोना-जिहाद” जैसे भड़काऊ शब्दों से आतंक का प्रतीक बनाया गया। यह सब सरकार की महामारी से निपटने की नाकामी से ध्यान हटाने के लिए किया गया।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा का यह फैसला यह दर्शाता है कि जब तथ्यों को प्राथमिकता दी जाए, तो न्याय संभव है। हालांकि, यह जीत आसान नहीं थी—इसके लिए पांच साल लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई, जिसमें आरोपियों को मानसिक पीड़ा, आर्थिक तंगी और सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा। 2020 में 36 विदेशी नागरिकों की रिहाई के साथ यह मामला प्रशासनिक अतिरेक और चुनिंदा अभियोजन की उस प्रवृत्ति को उजागर करता है, जिसका मकसद एक विशेष समुदाय को बदनाम करना था।
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया सरकार से मांग करती है कि वह 950 से अधिक विदेशी नागरिकों को ब्लैकलिस्ट करने और झूठे मुकदमे चलाने के लिए जवाबदेही तय करे। हम मीडिया से भी अपील करते हैं कि वह अपने उस भूमिका की ईमानदारी से समीक्षा करे, जिसमें उसने धार्मिक आधार पर भेदभाव कर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की गाइडलाइंस का भी उल्लंघन किया।
हम वरिष्ठ अधिवक्ता अशीमा मंडला और उनकी कानूनी टीम के अथक प्रयासों की सराहना करते हैं, जिनकी बदौलत यह न्याय संभव हो सका। यह फैसला सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं है—यह जनता के विश्वास को बहाल करने, संविधानिक मूल्यों को कायम रखने, और यह सुनिश्चित करने की पुकार है कि भारत में फिर कभी किसी समुदाय को बलि का बकरा न बनाया जाए।
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