ऑपरेशन सिंदूर पर सरकार को पारदर्शिता दिखानी चाहिए

भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष को समाप्त हुए कई सप्ताह बीत चुके हैं, जो जम्मू-कश्मीर के पहलगाम गांव में निर्दोष पर्यटकों पर हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद शुरू हुआ था। इसके बावजूद भारत सरकार अब तक इस सैन्य कार्रवाई की प्रकृति और उसके प्रभावों को लेकर देश को कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दे रही है। प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग को भी सरकार ने खारिज कर दिया है। देश की सर्वोच्च विधायी संस्था में इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे पर खुली और निष्पक्ष चर्चा की आवश्यकता थी, लेकिन इसके स्थान पर सरकार की ओर से अब तक केवल रहस्यमयी चुप्पी देखने को मिली है।

यह स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत चिंताजनक है। सैन्य संघर्ष समाप्त होने के बाद अमेरिका सहित कई वैश्विक शक्तियों ने इसका श्रेय स्वयं को दिया है, यह दावा करते हुए कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित परमाणु युद्ध को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आश्चर्य की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई सार्वजनिक मंचों से इस संघर्ष को “जीत” बताकर प्रस्तुत किया, लेकिन उन्होंने कभी इन अंतरराष्ट्रीय दावों का खंडन नहीं किया। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि भारत की रक्षा नीति में अमेरिका और इज़राइल जैसे देशों की भूमिका कितनी गहरी हो चुकी है? यह सर्वविदित है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद भारत ने अमेरिका और इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग को काफी तेज़ी से बढ़ाया है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब देश की जनता को संघर्ष से जुड़े तथ्यों की कोई जानकारी नहीं दी गई, तब भारत के वरिष्ठ रक्षा अधिकारी अंतरराष्ट्रीय मीडिया को खुले तौर पर विवरण दे रहे थे। भारतीय नागरिकों को यह तक नहीं बताया गया कि देश को इस संघर्ष में कितना नुकसान हुआ, जबकि भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने एक विदेशी समाचार एजेंसी को दिए गए साक्षात्कार में स्वीकार किया कि भारत को भारी क्षति हुई है, जिसमें कुछ महत्वपूर्ण और अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की क्षति भी शामिल है।

एक और चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार ने विपक्षी दलों से किसी प्रकार की सलाह या संवाद किए बिना, विदेश यात्रा पर जाने वाले संसदीय प्रतिनिधिमंडल का चयन अपने स्तर पर एकतरफा तरीके से किया। यह सवाल उठता है कि इन प्रतिनिधियों का चयन किस आधार पर किया गया? क्या इसका उद्देश्य केवल सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक हितों को साधना था? ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ व्यक्तियों को केवल इसलिए चुना गया ताकि विपक्षी दलों के भीतर मतभेद पैदा किए जा सकें और घरेलू राजनीति में लाभ उठाया जा सके। क्या यह उचित है कि एक गंभीर राष्ट्रीय संकट को राजनीतिक लाभ उठाने का माध्यम बना लिया जाए, और कुछ चुनिंदा लोगों को इनाम स्वरूप विदेशी यात्राएं दी जाएं, जो वस्तुतः उनके घरेलू राजनीतिक ‘योगदानों’ की भरपाई मानी जा सकती हैं?

इलियास मुहम्मद थुंबे
राष्ट्रीय महासचिव, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया