सिविल सेवाओं में वंचित समुदायों का संरचनात्मक बहिष्कार खत्म किया जाए

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सीताराम खोईवाल ने संसद में केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में प्रस्तुत उस खुलासे पर गहरी चिंता व्यक्त की है, जिसमें देश की शीर्ष सिविल सेवाओं में वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व में गंभीर असंतुलन उजागर हुआ है। 12 फ़रवरी को राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा रखे गए आँकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय विदेश सेवा में अब भी अधिकांश अधिकारी सामान्य वर्ग से आते हैं, जबकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की उपस्थिति सीमित बनी हुई है। ये वही संस्थाएँ हैं जो शासन, सुरक्षा और कूटनीति की दिशा तय करती हैं। खोईवाल ने कहा कि यह स्थिति सामाजिक न्याय और समान अवसर के संवैधानिक वादे को पूरा करने में निरंतर विफलता को दर्शाती है।

उन्होंने रेखांकित किया कि वर्ष 2020 से 2024 के बीच इन तीनों सेवाओं में वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व प्रतिशत और वास्तविक संख्या दोनों ही स्तरों पर अनुपातहीन रूप से कम बना हुआ है। उनके अनुसार ऐसा बहिष्कार समावेशी निर्णय प्रक्रिया को कमजोर करता है और सार्वजनिक प्रशासन को उन सामाजिक वास्तविकताओं से दूर कर देता है जिनकी सेवा के लिए वह स्थापित है। यह चिंता इस तथ्य से और गहरी हो जाती है कि स्वीकृत पदों की बड़ी संख्या अब भी रिक्त पड़ी है, जिससे न केवल प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है बल्कि प्रतिनिधिक शासन के लिए आवश्यक विविध आवाज़ों का प्रवेश भी टलता रहता है।

इस स्थिति को तात्कालिक राष्ट्रीय महत्व का विषय बताते हुए खोईवाल ने सभी कार्यरत अधिकारियों का पूर्ण श्रेणीवार विवरण सार्वजनिक करने, संवैधानिक आरक्षण मानकों का कड़ाई से पालन करते हुए समयबद्ध भर्ती सुनिश्चित करने तथा रिक्त पदों को बिना विलंब भरने की मांग की। उन्होंने जोर देकर कहा कि सिविल सेवाओं की संरचना में सार्थक सुधार इस बात के लिए अनिवार्य है कि राज्यसत्ता हिंदुस्तान की व्यापक सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करे, न कि जड़ जमाए विशेषाधिकार को और मजबूत बनाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश की सर्वोच्च प्रशासनिक संस्थाओं में समानुपातिक प्रतिनिधित्व के बिना वास्तविक लोकतांत्रिक शासन की कल्पना संभव नहीं है।