वन अधिकार क़ानून को बर्बाद करना बंद करो

हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क़ानूनों में से कुछ — वन अधिकार अधिनियम (FRA) और सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) — जिन्होंने देश के सबसे हाशिए पर खड़े लोगों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी सशक्त किया है, आज मनमाने कार्यपालिका के निर्णयों की वजह से गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं, जो उनकी प्रभावशीलता को कमज़ोर कर सकते हैं।

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 में पारित किया गया था ताकि आदिवासी जैसे परंपरागत वनवासियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके। औपनिवेशिक शासन और स्वतंत्रता के बाद के दौर में इन समुदायों को बड़े पैमाने पर दमन, विस्थापन और अपने ही निवास क्षेत्रों से बेदखली का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप, भारी संख्या में आदिवासी अपने ही देश में शरणार्थी बनने को विवश हुए और उनकी आजीविका पर लगातार हमले ही कई आदिवासी क्षेत्रों में हिंसक और उग्रवादी आंदोलनों के उभरने के प्रमुख कारण बने। राज्य ने इन समस्याओं को केवल “क़ानून और व्यवस्था” का मुद्दा मानकर भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात कर दिया।

यद्यपि FRA राज्य प्रायोजित इस आतंक को पूरी तरह रोक नहीं पाया, लेकिन इसने आदिवासियों को अपने पारंपरिक आवासों और जंगलों की रक्षा करने का अधिकार दिया, जिन्हें खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और सरकारी प्रतिष्ठानों जैसे पुलिस कैंप आदि के लिए बलपूर्वक औद्योगिक व व्यावसायिक संपत्तियों में बदला जा रहा था। इन गतिविधियों ने आदिवासियों को कोई लाभ नहीं दिया, बल्कि उन्हें अपने ही वतन में “अनचाहा और फेंक देने योग्य” समझा गया। फिर भी FRA ने उन्हें इन हमलों से लड़ने का कानूनी हथियार दिया, जैसा कि ओडिशा के नियामगिरि पहाड़ियों पर वेदांता कंपनी की खनन योजना को डोंगरिया कोंध समुदाय द्वारा रोकने की ऐतिहासिक जीत में देखा गया।

लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सरकारी तंत्र का रुख़ पूरी तरह बदल गया। सरकार में तथाकथित “विकासवादी लॉबी” हावी हो गई और अब वे और अधिक साहसिक कदम उठाकर दूर-दराज़ के क्षेत्रों में आदिवासियों को उनके अधिकारों से वंचित करने पर उतारू हैं।

इसका सबसे खतरनाक उदाहरण अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में देखने को मिल रहा है, जहाँ कुछ अत्यंत संवेदनशील आदिवासी समुदाय रहते हैं। इनमें से कई समुदाय बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे रहते हैं और बाहरी संपर्क उनके लिए महामारी जैसी घातक बीमारियाँ लेकर आ सकता है, जो उनके सामूहिक विनाश का कारण बन सकता है।

फिर भी केंद्र सरकार ‘ग्रेट निकोबार परियोजना’ को तेज़ी से आगे बढ़ा रही है। इसमें एक ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, पावर प्लांट और टाउनशिप बनाने के साथ-साथ द्वीप समूह को जोड़ने वाला एक विशाल राजमार्ग भी शामिल है। यह बहु-अरब डॉलर की परियोजना कुछ हिंदुस्तानी और विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों को और अमीर बनाएगी, लेकिन इसकी भारी क़ीमत आदिवासियों को चुकानी होगी।

इस परियोजना के लिए सरकार 13,000 हेक्टेयर से अधिक जंगलों को अधिग्रहीत करना चाहती है और वहाँ के परंपरागत निवासियों को उजाड़ना चाहती है। FRA के नियमों के अनुसार, ऐसा करने के लिए ग्राम सभाओं की विस्तृत प्रक्रिया और पारदर्शी परामर्श आवश्यक है।

लेकिन केंद्र सरकार ने इन प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए केवल निकोबार प्रशासन से एक औपचारिक “सहमति पत्र” हासिल कर लिया। राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अगस्त 2022 में निकोबार के उपायुक्त ने प्रमाणित कर दिया कि FRA के अंतर्गत सभी अधिकार तय और निपटाए जा चुके हैं और परंपरागत निवासियों से सहमति मिल चुकी है। जबकि यह दावा पूरी तरह झूठा है। लिटिल और ग्रेट निकोबार की आदिवासी परिषद ने स्पष्ट किया कि FRA की कोई भी प्रक्रिया कभी नहीं अपनाई गई और न ही निवासियों की सहमति ली गई। अब यह मामला कोलकाता हाईकोर्ट में विचाराधीन है।

सबसे चिंताजनक है केंद्र सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय का रवैया, जो FRA के तहत वनवासियों के अधिकारों की रक्षा करने वाला नोडल मंत्रालय है। लेकिन इस मंत्रालय ने हाईकोर्ट में हलफ़नामा दायर कर यह कहा है कि FRA के क्रियान्वयन में उसकी कोई भूमिका नहीं है और यह राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों की ज़िम्मेदारी है। उसने तो यहाँ तक आपत्ति की कि हाईकोर्ट ने उसे ग्रेट निकोबार परियोजना के मामले में प्रतिवादी क्यों बनाया।

यह मंत्रालय की ज़िम्मेदारियों से साफ़ पलायन है। यह शर्मनाक है कि जिसे आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए, वही मंत्रालय यह दावा कर रहा है कि उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कॉरपोरेट दबाव और ज़्यादा होता है, ऐसे में प्रभावित लोगों को न्याय मिलना लगभग असंभव है।

ओडिशा के डोंगरिया कोंधों की तरह लंबे संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ने की क्षमता निकोबार के आदिवासियों में नहीं है। उनके अधिकारों के संरक्षक ही उन्हें उनके हाल पर छोड़ रहे हैं। यह केंद्र सरकार के जनजातीय मंत्रालय और उसके मंत्री जुएल ओराम की सीधी गैरज़िम्मेदारी है, जो ख़ुद एक आदिवासी नेता होते हुए भी राजनीतिक दबाव में ज़िम्मेदारी से बच रहे हैं।

अब सवाल यह है कि मंत्रालय अचानक अपना रुख़ क्यों बदल रहा है? इसका एक ही जवाब है — शीर्ष स्तर से राजनीतिक दबाव। जब हज़ारों करोड़ रुपये के कॉरपोरेट हित जुड़े हों, तो सारे नियम ताक पर रख दिए जाते हैं। निकोबार का 81,000 करोड़ रुपये का एयरपोर्ट और सीपोर्ट प्रोजेक्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन दुर्भाग्य से यह FRA के पतन की शुरुआत है — वही क़ानून जिसने हिंदुस्तान के पारंपरिक वनवासियों और आदिवासियों, यानी हमारे सबसे संवेदनशील नागरिकों की रक्षा करने की कोशिश की थी।

इलयास मुहम्मद थुम्बे
राष्ट्रीय महासचिव