
मोदी का ‘दिमागी नक्सल’ बयान: असहमति को बदनाम करने की कोशिश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वैचारिक आलोचकों को ‘दिमागी नक्सल’ कहना बेहद निंदनीय है। सशस्त्र नक्सलवाद के लगभग समाप्त होने का दावा करने के बाद अब उन्होंने निशाना उन लोगों की ओर मोड़ दिया है जो उनकी सरकार से सवाल करते हैं, उसकी नीतियों की आलोचना करते हैं या उसके नैरेटिव को चुनौती देते हैं। ऐसे लोगों को ‘चिह्नित कर अलग थलग’ करने का आह्वान वैध लोकतांत्रिक असहमति को उग्रवाद से जोड़कर बदनाम करने की कोशिश है।
लोकतंत्र में आलोचना, विरोध और स्वतंत्र विचार अपराध नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक स्वतंत्रता की बुनियादी अभिव्यक्तियां हैं। बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए किसी अस्पष्ट और गैर कानूनी श्रेणी का इस्तेमाल लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है और असहमति की आवाजों में भय पैदा करता है। भारत को बदनाम करने की राजनीति और वैचारिक निगरानी नहीं, बल्कि जवाबदेही और संवाद की जरूरत है।
देहलान बाकवी
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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