मोदी का असम भाषण: नफ़रत की राजनीति का नक्शा

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव पी. अब्दुल मजीद फ़ैज़ी ने आज असम के दरांग ज़िले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भड़काऊ भाषण की कड़ी निंदा की है, जिसमें उन्होंने खुलेआम तथाकथित “घुसपैठियों” से “लाखों एकड़” भूमि वापस लेने का दावा किया। यह बयान केवल तथ्यों की तोड़-मरोड़ नहीं बल्कि करोड़ों हिंदुस्तानी नागरिकों की गरिमा और अधिकारों पर सुनियोजित हमला है, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा का नक़ाब पहनाकर पेश किया जा रहा है। मोदी के शब्द भाजपा की ज़हरीली साम्प्रदायिक राजनीति का हिस्सा हैं, जिसका मक़सद पूरे एक समुदाय को चुनावी फ़ायदे के लिए बदनाम करना है, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त अन्याय और पीड़ा की कहानी कहती है।
इन झूठे बयानों का पर्दाफ़ाश ठोस तथ्यों से होना चाहिए। 2016 से अब तक 15,270 से अधिक परिवारों को उजाड़ा गया है, जिनमें अधिकतर बांग्ला-भाषी मुसलमान हैं। ये कोई विदेशी “घुसपैठिए” नहीं बल्कि असम के मूल हिंदुस्तानी नागरिक हैं। बहुत से लोग राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में दर्ज हैं, वैध ज़मीन के दस्तावेज़ जैसे रायती पट्टा रखते हैं और पीढ़ियों से इन इलाक़ों में रह रहे हैं। भाजपा की उजाड़ अभियान—2021 के धालपुर से लेकर हालिया गोलपाड़ा और बिश्वनाथ तक—ने बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के घरों, मस्जिदों और स्कूलों को तोड़ डाला, और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के शासनकाल में 50,000 से अधिक लोगों को बेघर कर दिया। 2016 से अब तक कम से कम आठ मुसलमानों को इन अभियानों में गोलियों से मौत के घाट उतारा गया है। यह ज़मीन की वापसी नहीं बल्कि जातीय सफ़ाए का दूसरा नाम है।
मोदी द्वारा “लैंड जिहाद” जैसे गढ़े हुए हिंदुत्ववादी षड्यंत्र सिद्धांत का सहारा लेना भाजपा की साम्प्रदायिक नीयत को उजागर करता है। इस तरह की किसी मुस्लिम साज़िश का कोई सबूत मौजूद नहीं है। जनगणना के आँकड़े साफ़ दिखाते हैं कि असम में मुस्लिम आबादी का अनुपात 1951 में 24.86% से 2011 में 34.22% तक पहुँचना स्वाभाविक जन्मदर के कारण हुआ है, न कि 1971 के बाद किसी कथित घुसपैठ से। राष्ट्रीय औसत की तरह असम में भी जन्मदर लगातार गिर रहा है। सरमा द्वारा 2041 तक असम में मुस्लिम बहुसंख्या का दावा केवल भय फैलाने और चुनाव से पहले हिंदू वोटों को समेकित करने का हथकंडा है—जैसे पहले भी चुनावी हिंसा को योजनाबद्ध किया गया था। इन उजाड़ अभियानों का समय उपचुनावों के साथ मिलना भाजपा की अवसरवादी राजनीति को और बेनक़ाब करता है, जहाँ रोज़गार, बाढ़ और विकास की नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए कमज़ोर मुसलमानों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
सबसे भयावह पहलू यह है कि इन कार्रवाइयों ने मानवीय त्रासदी को जन्म दिया है। हज़ारों लोग तिरपाल के नीचे शरण लिए हुए हैं—बिना छत, बिना रोज़गार, बिना उम्मीद। बच्चे अनाथ हो रहे हैं, महिलाएँ विधवा बन रही हैं, और इंसानी कीमत लगातार बढ़ रही है। भाजपा न केवल आँख मूँद रही है बल्कि खाली कराई गई ज़मीन पर कॉर्पोरेट परियोजनाओं की मिलीभगत की संभावना गहराती जा रही है। यह शासन नहीं बल्कि नफ़रत की राजनीति को साधन बनाकर अल्पसंख्यक विरोधी ज़हरीला शासन है।
एसडीपीआई इन भेदभावपूर्ण उजाड़ अभियानों को तुरंत रोकने, मौतों और विस्थापन की न्यायिक जाँच कराने और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की सख़्त माँग करती है। हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों से भी इस संकट पर ध्यान देने का आह्वान करते हैं। इतिहास इस नफ़रत के दौर को हिंदुस्तान का सबसे काला समय करार देगा।
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