
दो दिन की अव्यवस्था के बाद सरकार ने आखिरकार SIR पर बहस की अनुमति दी। लेकिन भरोसे की खाई और गहरी हो गई।
विशेष गहन संशोधन पर चर्चा के लिए सरकार तभी तैयार हुई जब विपक्ष ने लगातार दो दिनों तक विरोध कर संसद को ठप कर दिया। यह हिचकिचाहट खुद बताती है कि चुनावी सुधारों में पारदर्शिता को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता कितनी कमजोर है।
मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को लेकर बढ़ती जनचिंता पर जवाब देने के बजाय सरकार ने चुप्पी और बचाव का रास्ता चुना। और अब जब SIR को सामान्य चुनाव सुधारों की एक अस्पष्ट श्रेणी में धकेला जा रहा है, तो यह स्पष्ट दिखता है कि सरकार असली मुद्दों को संबोधित करने की बजाय अपनी राजनीतिक छवि बचाने में अधिक रुचि रखती है।
देश के कई हिस्सों में मनमानी मतदाता विलोपन और लक्षित रूप से वोटर अधिकार छीनने की आशंका बढ़ रही है। विपक्ष बार-बार चेतावनी दे रहा है कि यह पूरा अभ्यास वोट चोरी का संगठित प्रयास बन सकता है। यदि प्रक्रिया साफ और निष्पक्ष है, तो सरकार ने बुनियादी चर्चा से ही परहेज क्यों किया? क्या छिपाने की कोशिश हो रही थी?
एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र सवालों का सामना करता है। डरी हुई सरकार उनसे बचती है।
9 दिसंबर अब केवल एक तारीख नहीं है। यह परीक्षा होगी कि सरकार अपने कदमों को जांच परख के लिए तैयार है या नहीं, और क्या वह साबित कर सकती है कि भारत की मतदाता सूची की पवित्रता सुरक्षित है।
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