
दोहा में इस्राइली हमला : अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की शर्मनाक मिसाल
दोहा, क़तर की राजधानी में मंगलवार शाम को फ़िलिस्तीन के हमास नेताओं के आवासीय परिसर पर किया गया हमला अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था और वैश्विक व्यवस्था पर सबसे क्रूर हमलों में से एक था, जिसकी कूटनीतिक इतिहास में बहुत कम मिसाल मिलती है। यह एक स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन था—गंभीर और आपराधिक क़दम।
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्वीकार किया कि आईडीएफ (IDF) के हमले इस्राइल द्वारा योजनाबद्ध और संचालित किए गए थे और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं की है। लेकिन उनका विजयोल्लास 24 घंटे के भीतर ही ग़ायब हो गया, क्योंकि आईडीएफ और इस्राइली नेतृत्व के अपराधपूर्ण कृत्य अब वैश्विक जनमत के सामने बेनक़ाब हो चुके हैं और इस्राइल को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। लगता है कि इस्राइली नेतृत्व का यह दुस्साहस पूरी तरह विफल रहा है, क्योंकि वे अपने किसी भी उद्देश्य को हासिल नहीं कर पाए। इसके विपरीत, इस्राइली नेतृत्व अब अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन के लिए आपराधिक अभियोग का सामना करने के योग्य बन चुका है।
आईडीएफ का यह हमला कथित तौर पर हमास की राजनीतिक नेतृत्व को दोहा में समाप्त करने के उद्देश्य से किया गया था। हमास के नेता, जिनमें इसके राजनीतिक ब्यूरो के उपाध्यक्ष ख़लील अल-हय्या भी शामिल थे, अमेरिका द्वारा प्रस्तुत नवीनतम शांति प्रस्ताव पर विचार-विमर्श के लिए दोहा में एकत्र हुए थे, ताकि ग़ज़ा में हो रही रक्तपात की स्थिति का समाधान निकाला जा सके। अब यह साफ़ हो गया है कि अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर एक षड्यंत्र रचा था—हमास नेतृत्व को एक ऐसे देश में धोखे से समाप्त करने का, जो कभी भी विवाद का पक्षकार नहीं रहा। दरअसल, 7 अक्टूबर 2023 को इस्राइल में हुई घटनाओं और सैकड़ों इस्राइली बंदियों को हमास द्वारा पकड़े जाने के बाद से, जब लगातार हिंसा भड़क उठी, उसी समय से क़तर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और पिछले महीनों में बड़ी संख्या में इस्राइली बंदियों की रिहाई सुनिश्चित की।
यही मानवीय ज़िम्मेदारी निभाते हुए क़तर जब मध्यस्थ की भूमिका में था, तभी इस्राइल ने पीठ में वार करते हुए सबसे विश्वासघाती ढंग से हमला कर दिया। ऐसे अत्याचारी के साथ शांति की कोई भी कोशिश अब असंभव हो गई है। इसलिए क़तर ने घोषणा की है कि वह इस्राइल के साथ शांति वार्ताओं से हट जाएगा, जो कि मध्य-पूर्व में भविष्य की किसी भी शांति प्रयास के लिए एक बड़ा झटका है। इस्राइल जिस तरह अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और कूटनीतिक मानदंडों को रौंदते हुए निरंकुश और ग़ैर-जिम्मेदाराना तरीक़े से काम कर रहा है, ऐसे देश से वार्ता का कोई औचित्य नहीं है। वैश्विक समुदाय के लिए इस्राइल से निपटने का एकमात्र रास्ता यही है कि उसे एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी घोषित किया जाए और उसकी पूरी नेतृत्व व्यवस्था पर हर स्तर पर प्रतिबंध लगाए जाएं।
दुनिया भर के अनेक देशों और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने दोहा में इस्राइल के इस बिन बुलाए हमले की निंदा की है। लेकिन असली ज़िम्मेदारी अमेरिका की है, जिसने इस्राइल को इस तरह की बेलगाम हरकतों के लिए ताक़त दी। अमेरिका ने इस अराजकता को रोकने के लिए कुछ नहीं किया है और नतीजा न केवल इस्राइल के लिए बल्कि स्वयं अमेरिका के लिए भी विनाशकारी होगा। अंततः न्याय की ही जीत होगी और इस्राइल निश्चित रूप से आत्म-विनाश की ओर अग्रसर है।
हिंदुस्तान को भी इतिहास से सबक लेना चाहिए। फ़िलिस्तीन और उसके लोगों को न्याय दिलाने के प्रश्न पर हिंदुस्तान ने हमेशा शांति-पूर्ण समाधान का समर्थन किया और हिंसा को कभी स्वीकार नहीं किया। लेकिन हाल के वर्षों में हिंदुस्तान का रुख़ अधिक प्रोस्राइली होता गया है, जिसने अरब जगत में हमारी प्रतिबद्धता और ईमानदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क़तर के अमीर से हालिया वार्ता सकारात्मक क़दम है, लेकिन अब समय आ गया है कि हिंदुस्तान और मज़बूत और स्पष्ट रुख़ अपनाए—क़तर जैसे मित्र राष्ट्र पर हमले की बिना किसी समझौते के निंदा करे।
इलियास मुहम्मद थुम्बे
राष्ट्रीय महासचिव
No Comments