चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए

भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली की बुनियाद चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर टिकी हुई है। इसी प्रक्रिया को निष्पक्ष व स्वतंत्र रूप से संचालित करने की संवैधानिक ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग (Election Commission of India) की है। लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों ने आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी द्वारा प्रकाशित किए गए एक विस्तृत लेख “महाराष्ट्र में मैच-फिक्सिंग” ने इस बहस को और तीव्र कर दिया है। इस लेख में उन्होंने वर्ष 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में व्यापक गड़बड़ियों, अपारदर्शिता और प्रबंधन की विफलताओं का आरोप लगाया है। विशेष रूप से, उन्होंने मतदाता सूची में संदेहास्पद नामों को शामिल किए जाने, लोकसभा चुनावों के बाद अचानक वोटरों की संख्या में अस्वाभाविक वृद्धि, और मतदान के अंतिम चरण में अप्रत्याशित उछाल जैसे मुद्दों को उठाया, जिससे भाजपा-शिवसेना (शिंदे) गठबंधन को विजय प्राप्त करने में मदद मिली।

आयोग द्वारा इन आरोपों पर दी गई प्रतिक्रिया ने विवाद को शांत करने के बजाय और अधिक बहस को जन्म दिया है। चुनाव आयोग का यह दावा कि प्रमुख विपक्षी दलों ने कभी इस विषय पर स्पष्टीकरण हेतु संपर्क नहीं किया, तथ्यात्मक रूप से असत्य प्रतीत होता है। कई राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने विभिन्न राज्यों में चुनावों की निष्पक्षता पर दस्तावेज़ों और तथ्यों के आधार पर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं, जिन्हें बार-बार नजरअंदाज़ किया गया।

इस पूरे विवाद के केंद्र में वह प्रक्रिया है, जिसके तहत अब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जा रही है। संविधान के अनुसार, चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था होनी चाहिए। लेकिन हालिया बदलावों ने इस स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद कि मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति का हिस्सा बनाया जाए, केंद्र सरकार ने उसे अनदेखा कर दिया। आज जिस प्रकार से सरकार द्वारा चुने गए अधिकारियों की नियुक्ति की जा रही है, उससे उनके प्रति पक्षपातपूर्ण रवैये की आशंका प्रबल होती है।

इसके अतिरिक्त, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) की विश्वसनीयता को लेकर जनता में जो व्यापक संदेह व्याप्त हैं, वे अभी तक दूर नहीं किए गए हैं। विपक्षी दल लगातार यह मांग कर रहे हैं कि जहाँ कहीं भी संदेह हो, वहाँ VVPAT पर्चियों की अनिवार्य गिनती की जाए, लेकिन इस पर कोई गंभीर पहल नहीं की गई है।

इतना ही नहीं, कई स्थानों पर वास्तविक मतदाताओं के नाम यह कहकर हटा दिए जाते हैं कि वे विदेशी हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के मूल अधिकारों पर कुठाराघात है और विशेष रूप से मुस्लिमों, दलितों और आदिवासियों जैसे वंचित वर्गों को प्रभावित करती है।

इन परिस्थितियों में, यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि सरकार और चुनाव आयोग जनता के सामने उठे प्रश्नों का जवाब दें तथा यह सुनिश्चित करें कि भारत में चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप हो।

एडवोकेट शरफुद्दीन अहमद
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया