मेक इन इंडिया तो ठीक है, लेकिन इंडिया को सुरक्षित भी बनाओ

देशभर में हाल के दिनों में लगातार हो रहे धमाके, आगज़नी और अन्य औद्योगिक दुर्घटनाओं की श्रृंखला ने हिंदुस्तान के कार्यस्थलों में औद्योगिक सुरक्षा की खतरनाक स्थिति को उजागर कर दिया है। मंगलवार को तमिलनाडु के चिन्नाकमनपट्टी में एक पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट में आठ लोगों की मौत हो गई, जबकि सोमवार को तेलंगाना के हैदराबाद में एक फार्मास्युटिकल फैक्ट्री में लगी भीषण आग में 36 लोग जलकर मर गए। इन दोनों हादसों की देश और विदेश की मीडिया में व्यापक रिपोर्टिंग हुई है, लेकिन यह सवाल कि ऐसी औद्योगिक दुर्घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं, अभी तक ठीक से न तो पूछा गया है और न ही कोई संतोषजनक जवाब मिला है।

हकीकत यह है कि हिंदुस्तान दुनिया के प्रमुख औद्योगिक देशों की कतार में आने के लिए अपने औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने में तो जी-जान से लगा है, लेकिन कार्यस्थलों पर कड़े सुरक्षा मानकों को लागू करने की ज़रूरत की घोर उपेक्षा करता रहा है। यह सर्वविदित है कि औद्योगिक उत्पादन में अक्सर अत्यंत ज्वलनशील या अन्य खतरनाक रसायनों और सामग्रियों का उपयोग होता है, और कारखानों के प्रबंधन सुरक्षा मानकों को लागू करने में जानबूझकर कोताही बरतते हैं ताकि लागत कम हो और मुनाफा ज़्यादा। वहीं, सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार सरकारी अधिकारी नियमित निरीक्षण और अन्य उपायों के प्रति या तो भ्रष्टाचार के चलते आंखें मूंद लेते हैं या राजनीतिक दबावों में रहते हैं, क्योंकि सत्ता में बैठी अधिकतर राजनीतिक पार्टियां पूंजीपतियों से मिलीभगत में रहती हैं — जो उनके चुनावी खर्चों को वहन करते हैं।

इसका नतीजा यह है कि श्रमिकों की सुरक्षा सत्ता में बैठी सरकारों की प्राथमिकता नहीं है। उदाहरण के लिए फार्मास्युटिकल उद्योग को ही लें — यह हिंदुस्तान के सबसे बड़े निर्यात कारोबारों में शामिल है और देश के लिए एक प्रमुख विदेशी मुद्रा अर्जक है, जिसमें हजारों उत्पादन इकाइयाँ हैं और लाखों श्रमिक कार्यरत हैं। इतनी आर्थिक ताक़त और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों को पूरा करने की जिम्मेदारी के बावजूद, इनमें से अधिकांश इकाइयाँ सुरक्षा उपायों की अनदेखी करती हैं। अगस्त 2024 में विशाखापत्तनम के पास अनकापल्ली में एक फार्मा यूनिट में बड़ा हादसा हुआ था, और अप्रैल 2025 में हैदराबाद में एक और दुर्घटना हुई।

ऐसी ही स्थिति तमिलनाडु केंद्रित पटाखा उद्योग की भी है। मंगलवार की दुर्घटना बीते कुछ वर्षों में घटी कई घटनाओं में नवीनतम है। समाचार पत्रों के अनुसार, 2025 के पहले छह महीनों में ही राज्य में पटाखा इकाइयों में आठ हादसे हुए हैं जिनमें 26 लोगों की मौत हुई है। 2024 में 17 हादसों में 52 लोगों की जान गई, जबकि 2023 में 27 घटनाओं में 79 लोगों की मृत्यु हुई थी। देश के अन्य हिस्सों में स्थित अन्य उद्योगों में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं।

इतनी जानलेवा घटनाओं के बावजूद, ऐसी दुर्घटनाओं के मूल कारणों की गहराई से जांच कर उन्हें स्थायी रूप से रोकने के लिए कोई ठोस और निर्णायक कार्रवाई नहीं की गई है। ऐसा नहीं है कि इन हादसों को रोकने के प्रभावशाली उपाय मौजूद नहीं हैं — समस्या यह है कि हमारे प्रशासन और उद्योगपति इन उपायों को अपनाने में रुचि नहीं रखते या इच्छाशक्ति की कमी है।

हिंदुस्तान में औद्योगिक दुर्घटनाएं एक घिनौनी सच्चाई बन चुकी हैं — और इससे भी शर्मनाक है यह कि शासन और प्रशासन श्रमिकों द्वारा झेले जा रहे भयावह संकटों को लेकर बेहद उदासीन हैं। यह स्थिति कोई नई नहीं है — 1984 में भोपाल की यूनियन कार्बाइड यूनिट में हुए गैस रिसाव हादसे से लेकर अब तक देश इस सच्चाई को भोग रहा है। उस हादसे में हजारों लोग मारे गए थे और हजारों आजीवन अपंग हो गए। उस समय भी अमेरिकी कंपनी की घोर लापरवाही के बावजूद सत्तारूढ़ ताक़तों ने उसके मालिकों और उच्च अधिकारियों को न्याय से बचा लिया, और पीड़ितों को कभी भी ठीक से मुआवज़ा नहीं दिया गया। वही अमानवीय रवैया आज भी प्रशासनिक ढांचे में ज्यों का त्यों बना हुआ है, भले ही सरकारें बदली हों।

बी. एम. कांबले
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया