इंदौर जल त्रासदी: जवाबदेही की शुरुआत शीर्ष नेतृत्व से होनी चाहिए

सात लोगों की जान चली गई और सौ से ज़्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हुए। कारण साफ है, पीने के पानी में सीवेज मिल गया और यह उसी इंदौर में हुआ, जिसे बार-बार “भारत का सबसे साफ शहर” बताया जाता है। यह कोई हादसा नहीं है। यह सिस्टम की लापरवाही और शासन की पूरी नाकामी है।

जब लोग अपने ही नल का पानी पीकर बीमार पड़ें, तो सच्चाई साफ हो जाती है चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया गया, व्यवस्थाएँ फेल हुईं और सत्ता में बैठे लोगों ने जिम्मेदारी लेने से इनकार किया। सालों से इंदौर को रैंकिंग और पीआर के ज़रिये चमकाया गया। आज वह झूठी तस्वीर टूट गई है। पुरस्कार बचा लिए गए, लेकिन लोगों की जान नहीं।

इंदौर-1 के विधायक कैलाश विजयवर्गीय दशकों से शहर की सियासत और नगर व्यवस्था पर प्रभाव रखते आए हैं, पार्षद, महापौर, विधायक और अब कैबिनेट मंत्री। अगर उनके नेतृत्व में इंदौर सच में “मॉडल सिटी” होता, तो यह त्रासदी कभी नहीं होती। दुख जताने के बजाय, वे सवाल पूछने पर पत्रकारों से उलझते नज़र आए।नेतृत्व का मतलब जिम्मेदारी लेना होता है, नारेबाज़ी के पीछे छिपना नहीं।

एसडीपीआई, कैलाश विजयवर्गीय के तत्काल इस्तीफ़े की और एक पारदर्शी जांच की मांग करती है, जिसमें केवल अधिकारियों को बलि का बकरा न बनाकर राजनीतिक जवाबदेही तय की जाए। हम यह भी मांग करते हैं कि, पानी की गुणवत्ता से जुड़ी सभी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएँ और प्रभावित परिवारों को आजीवन मुफ्त इलाज दिया जाए।
इंदौर के दर्द को पीआर से नहीं ढका जा सकता। जानें गई हैं और अब किसी को जवाब देना होगा।

एडवोकेट शरफुद्दीन अहमद
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष