सुप्रीम कोर्ट का ज़मानत सुधार फ़ैसला – अंडरट्रायल्स के लिए उम्मीद की किरण

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मोहम्मद शफ़ी ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश का स्वागत किया है, जिसमें हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट को ज़मानत और अग्रिम ज़मानत याचिकाओं का निपटारा दो माह के भीतर करने का आदेश दिया गया है। यह ऐतिहासिक निर्णय हमारी न्याय प्रणाली को पंगु बना चुकी लम्बी देरी की समस्या को चुनौती देता है, जिसने असंख्य व्यक्तियों को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में निहित मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार से अन्यायपूर्ण ढंग से वंचित किया है।

हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था गहरे तंत्रगत असफलताओं से ग्रसित है: सितंबर 2025 तक राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड के अनुसार ज़िला अदालतों में 2,62,000 से अधिक ज़मानत याचिकाएँ लंबित हैं। अंडरट्रायल कैदी, जो 5.73 लाख जेल आबादी का 76% हैं (इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 और एनसीआरबी), 131% क्षमता पर चल रही भीड़भाड़ वाली जेलों में सड़ रहे हैं। दलित, आदिवासी, मुस्लिम और ओबीसी जैसे वंचित तबके—जो 73% तक हैं—इसका सबसे ज़्यादा खामियाज़ा भुगतते हैं, जो एक भेदभावपूर्ण ढांचे को उजागर करता है। “ज़मानत नियम है, जेल अपवाद” के सिद्धांत को फ़ाइलों का बोझ, सुस्त जांच और अपर्याप्त न्यायिक संसाधन पूरी तरह खोखला बना देते हैं। ऐसी देरी न केवल संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन करती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी तोड़ती है, जिससे वंचित तबके पीड़ित होते हैं और प्रभावशाली लोग बच निकलते हैं।

यह निर्देश एक परिवर्तनकारी राह खोलता है—व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है, त्वरित जांच की मांग करता है और लंबित मामलों को कम करने के लिए तंत्र बनाने पर ज़ोर देता है। यदि इसे लागू किया गया, तो अंडरट्रायल कैदियों की संख्या घटेगी, जेलों का बोझ कम होगा और न्याय की गरिमा बहाल होगी। एसडीपीआई की मांग है कि हाईकोर्ट इसका कड़ाई से अनुपालन कराएँ, सरकार न्यायिक ढांचा और क़ानूनी सहायता को मज़बूत करे और संसद ज़मानत सुधार विधेयक, 2024 को शीघ्र पारित करे। यह फ़ैसला एक न्यायपूर्ण और समान हिन्दुस्तान की दिशा में निर्णायक कदम बने।