ग़ज़ा में युद्धविराम, फ़िलिस्तीन की राज्य स्थापना और इस्राइल के अपराधों पर मुक़दमे की मांग: एसडीपीआई

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (एसडीपीआई) के राष्ट्रीय महासचिव इलियास मुहम्मद थुम्बे ने संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित न्यूयॉर्क घोषणा का ऐतिहासिक स्वागत किया है। 142 देशों द्वारा दो-राष्ट्र समाधान के पक्ष में दिए गए मत ने यह साबित कर दिया है कि वैश्विक अंतरात्मा न्याय, शांति और फ़िलिस्तीनी जनता के सम्पूर्ण एवं अखंड अधिकारों के प्रति मज़बूती से खड़ी है। यह घोषणा उत्पीड़न और नरसंहार की अंधेरी छाया में उम्मीद की किरण है और यह स्पष्ट संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब ग़ज़ा में हो रहे अत्याचारों पर आँखें मूँदकर नहीं बैठ सकता।

लेकिन हम उन दस देशों इस्राइल, संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, हंगरी, माइक्रोनेशिया, नाउरू, पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी, पराग्वे और टोंगा
की निंदा करते हैं जिन्होंने इस प्रस्ताव का विरोध किया । इनका विरोध साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और नैतिक दिवालियापन की गंदी साज़िश को उजागर करता है। ख़ासतौर पर अमेरिका को नरसंहार को हथियारों से समर्थन देना बंद करना चाहिए। बाक़ी देश भी अपने ही नागरिकों के साथ धोखा कर रहे हैं क्योंकि वे अत्याचारी का साथ दे रहे हैं। यह वोट शांति का इंकार नहीं बल्कि युद्ध और जातीय सफ़ाए का समर्थन है।

एसडीपीआई ग़ज़ा में तुरंत और बिना शर्त युद्धविराम की मांग करता है ताकि इस्राइली हमले, जिसमें हज़ारों मासूम—ख़ासकर औरतें और बच्चे—मारे गए हैं, रोके जा सकें। सबसे अहम, हम 1967 की सीमाओं पर आधारित एक स्वतंत्र और मज़बूत फ़िलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना की मांग करते हैं, जिसकी राजधानी पूर्वी येरुशलम हो और जो नाकेबंदी व रंगभेद से आज़ाद हो।

घोषणा में हमास के निरस्त्रीकरण की मांग दरअसल एक मज़ाक है—क्योंकि असली आतंकवादी इस्राइल है, जिसे हर रोज़ हथियार दिए जाते हैं और जो फ़िलिस्तीनियों का ख़ून बहा रहा है। यह अन्याय है कि मज़लूम से हथियार छीनने की बात की जाए जबकि क़ाबिज़ लगातार बम और भूख बरसा रहा है। असली शांति तभी आएगी जब इस्राइल के हथियारों का जखीरा ख़त्म किया जाएगा।

एसडीपीआई ने यह भी मांग किया है कि इस्राइल और उसके प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर ग़ज़ा में युद्ध अपराध, मानवता के ख़िलाफ़ अपराध और नरसंहार के लिए तुरंत अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) में मुक़दमा चलाया जाए। अपराधियों को कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए—इंसाफ़ हर हाल में होना चाहिए।