
भ्रष्टाचार से लड़ने के नाम पर गैर-भाजपा सरकारों को परेशान करने की केंद्र की चाल का विरोध करें
लोकसभा में मानसून सत्र के अंतिम दिनों में पेश किए गए तीन विधेयक, जिनमें 130वाँ संविधान संशोधन विधेयक भी शामिल है, भ्रष्टाचार से लड़ाई के नाम पर गैर-भाजपा सरकारों को परेशान करने की एक खुली साज़िश है। यह उस चिंताजनक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद लगातार देखी जा रही है—जहाँ विपक्ष शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और अधिकारियों को केंद्रीय जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग के ज़रिए डराया-धमकाया जाता है।
प्रस्तावित विधेयकों के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री सहित कोई कार्यपालिका अधिकारी एक महीने से अधिक समय तक जेल में रहता है, तो उन्हें पद से हटा दिया जाएगा। केंद्र सरकार ने इन विधेयकों का बचाव करते हुए दावा किया है कि इनसे सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और जवाबदेही सुनिश्चित होगी और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री भी इनके दायरे में आएँगे।
लेकिन यह तर्क बेहद खोखला, मनगढ़ंत और आधा सच–आधा झूठ है। संघ परिवार की सभी मुहिमों की तरह इसमें भी वस्तुनिष्ठता और सच्चाई के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी रणनीति अब भारतीय प्रशासन में भी घर करती जा रही है, जिससे उसकी विश्वसनीयता और गरिमा दोनों पर आँच आ रही है।
बीते अनुभवों पर एक नज़र डालने से ही स्पष्ट हो जाता है कि ये दावे बेमानी हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जैसी सभी केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ पूरी तरह केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं और विपक्षी नेताओं तथा मुख्यमंत्रियों तक को परेशान करने के लिए इनका दुरुपयोग सैकड़ों बार किया जा चुका है। कई मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोपों पर सत्ता में रहते हुए ही गिरफ्तार किया गया और उन्हें बिना ज़मानत महीनों जेल में रहना पड़ा। राहत सिर्फ़ सर्वोच्च न्यायालय से मिली, क्योंकि निचली अदालतें और यहाँ तक कि उच्च न्यायालय भी केंद्र के दबाव में ज़मानत देने से कतराते रहे।
यह दावा करना हास्यास्पद है कि प्रधानमंत्री भी इस कानून के तहत आएँगे। कौन-सी केंद्रीय एजेंसी प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में हथकड़ी लगाने की हिम्मत करेगी? क्या यह कल्पना भी की जा सकती है? दरअसल इस विधेयक का वास्तविक उद्देश्य संदिग्ध और दुर्भावनापूर्ण है। वर्तमान में भाजपा बहुमत से वंचित है और केंद्र सरकार राजनीतिक रूप से कमज़ोर स्थिति में है, इसलिए वह सत्ता में बने रहने के लिए विपक्षी दलों की एकता को तोड़ने हेतु केंद्रीय एजेंसियों को हथियार बनाना चाहती है। इतना ही नहीं, इन व्यापक शक्तियों से वे अपने सहयोगियों तक को धमका सकते हैं। ऐसे में नीतीश कुमार और एन. चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं को भी सतर्क हो जाना चाहिए, जिनकी सरकारों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप रहे हैं।
बिना किसी न्यायिक निगरानी और जवाबदेही के पुलिस और एजेंसियों को असीमित शक्तियाँ देना बेहद ख़तरनाक है। हाल के वर्षों में देखा गया है कि कई एजेंसियाँ मनमानी कर रही हैं और उनके मनगढ़ंत मामलों को अदालतों ने खारिज भी किया है। कई बार तो अदालतों ने इन एजेंसियों की कड़ी आलोचना भी की है। लेकिन न्यायिक हस्तक्षेप अक्सर देर से होता है और तब तक विपक्षी नेताओं और लोकतंत्र को गंभीर क्षति पहुँच चुकी होती है।
सच्चाई यह है कि भाजपा और केंद्र सरकार इन सभी चिंताओं से वाक़िफ़ हैं, फिर भी वे इन्हें नज़रअंदाज़ करके ऐसे मनमाने कदम उठा रही हैं। इसका एकमात्र मक़सद केंद्रीय एजेंसियों को अपने राजनीतिक हथियारों में बदलना है। भाजपा शासित राज्यों और यहाँ तक कि केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ भी भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगे हैं, लेकिन क्या ईडी, सीबीआई या किसी अन्य एजेंसी ने ज़रा भी कार्रवाई की? नहीं, और न ही कभी करेगी—क्योंकि इन एजेंसियों की डोर भाजपा और केंद्र सरकार के ताक़तवर नेताओं के हाथों में है।
इसलिए ऐसे दुर्भावनापूर्ण क़दमों का बचाव करने का कोई कारण नहीं है। इन्हें संसद के भीतर और बाहर, पूरी ताक़त से विरोध करना होगा। भ्रष्टाचार से लड़ना ज़रूरी है, लेकिन विपक्ष को कुचलने के लिए उसका बहाना बनाना लोकतंत्र के लिए बेहद ख़तरनाक है।
इलयास मुहम्मद थुम्बे
राष्ट्रीय महासचिव
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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