प्रचार को सम्मान देना सिनेमा की गरिमा का अपमान है
‘The Kerala Story’ को पुरस्कार देना धर्मनिरपेक्ष हिंदुस्तान का अपमान है

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया 71वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों द्वारा ‘The Kerala Story’ को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन और छायांकन के पुरस्कार देने के फैसले की कड़े शब्दों में निंदा करती है। यह घोषणा 1 अगस्त, 2025 को की गई। यह सम्मान उस फिल्म को दिया गया है जिसे व्यापक रूप से भ्रामक प्रचार और सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है। इससे न केवल हिंदुस्तान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को ठेस पहुँचती है, बल्कि सिनेमा की सांस्कृतिक विरासत की साख भी कमज़ोर होती है।

‘The Kerala Story’ ने केरल राज्य, जो अपनी सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जाना जाता है, को झूठे तौर पर “लव जिहाद” और आईएसआईएस की भर्ती का अड्डा दिखाया है। फिल्म का यह दावा कि 32,000 महिलाएं केरल से आईएसआईएस में शामिल हुईं, पूरी तरह से गलत पाया गया। ऑल्ट न्यूज़ की पड़ताल और गृह मंत्रालय से प्राप्त आरटीआई के अनुसार, 2014 से 2020 के बीच देशभर में आईएसआईएस से जुड़े मामलों में गिरफ्तार 177 लोगों में से केरल से मात्र 19 व्यक्ति थे। “लव जिहाद” का यह झूठा नैरेटिव, जिसे दक्षिणपंथी संगठनों ने फैलाया है, मुस्लिम समुदाय को बदनाम करता है और समाज में सांप्रदायिक दरारें गहराता है।

फिल्म की “स्पष्ट कहानी कहने की शैली” और “निर्मम यथार्थवादी छायांकन” की सराहना, जैसा कि जूरी अध्यक्ष आशुतोष गोवारिकर ने कहा, इसके तथ्यात्मक झूठ और विभाजनकारी प्रभाव की अनदेखी करती है। पश्चिम बंगाल में इस फिल्म पर प्रतिबंध और तमिलनाडु में इसके प्रदर्शनों में आई रुकावटें यह दर्शाती हैं कि इसका सामाजिक असर कितना विषैला रहा है। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे भाजपा-शासित राज्यों में इसे टैक्स फ्री किया जाना इसकी राजनीतिक पैरवी को उजागर करता है।

यह पुरस्कार भारत में उस चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘साबरमती रिपोर्ट’ जैसी फिल्मों को बढ़ावा दिया गया है, जो दक्षिणपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए तथ्यात्मक ज़िम्मेदारी से बचती हैं। ये फिल्में, जिनका समर्थन अक्सर भाजपा-शासित सरकारों द्वारा किया जाता है, इस्लामोफ़ोबिया को बढ़ावा देती हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण महाराष्ट्र के अकोला में 2023 में हुई सांप्रदायिक हिंसा है, जो ‘द केरल स्टोरी’ से संबंधित एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद भड़की थी।

ऐसी फिल्म को सम्मान देकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जैसी संस्था उन नैरेटिव्स को वैधता प्रदान कर रही है जो विभाजन को बढ़ावा देते हैं और हिंदुस्तान की बहुलतावादी संस्कृति को विकृत करते हैं।

एसडीपीआई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जूरी से अपील करती है कि वह ऐसे निर्णयों से बचे जो सांप्रदायिक और विभाजनकारी नैरेटिव्स को समर्थन दें। ऐसी प्रवृत्तियाँ एक स्वतंत्र संस्था के लिए अनुचित हैं और कला एवं संस्कृति के लिए हानिकारक भी। सिनेमा का उद्देश्य समाज में मेलजोल और सच्चाई को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि नफ़रत और झूठ को।

हम समस्त हिंदुस्तानियों से आह्वान करते हैं कि वे घृणा फैलाने वाले नैरेटिव्स को नकारें और हमारे देश के सांस्कृतिक व सामाजिक ताने-बाने में न्याय, समावेशिता और सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूती प्रदान करें।

पी. अब्दुल मजीद फैज़ी
राष्ट्रीय महासचिव
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया