एसटी के 83% , ओबीसी के 80% और एससी के 64% प्रोफेसर पद खाली;
बी.एम. कांबले ने उठाई जवाबदेही की मांग

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बी.एम. कांबले ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित फैकल्टी पदों की भयावह कमी पर केंद्र सरकार की घोर विफलता की कड़ी निंदा की है। यह संविधान में निहित सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। 24 जुलाई 2025 को राज्यसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों से यह चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है: अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के 80% प्रोफेसर पद (423 में से 339) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के 83% प्रोफेसर पद (144 में से 120) अब तक रिक्त हैं। अनुसूचित जाति (एससी) के साथ भी अन्याय हो रहा है, जहां 64% प्रोफेसर पद (308 में से 197) खाली हैं। इसके विपरीत, सामान्य वर्ग के केवल 39% प्रोफेसर पद रिक्त हैं—यह एक संस्थागत पूर्वाग्रह को उजागर करता है, जो केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (शिक्षकों के संवर्ग में आरक्षण) अधिनियम, 2006 की भावना को ठेस पहुंचाता है।


यह कोई एक बार की चूक नहीं है। 2024 में आरटीआई के जरिए मिले आंकड़ों के अनुसार, 11 आईआईटी में 415 ओबीसी, 234 एससी और 129 एसटी फैकल्टी पद खाली हैं। 2018 में 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर स्तर पर किसी भी ओबीसी उम्मीदवार की नियुक्ति नहीं की गई। सरकार द्वारा प्रचारित “मिशन मोड” भर्ती की बात खोखली साबित होती है, जब एक दशक से अधिक समय से पद खाली पड़े हैं। आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को “अयोग्य” बताकर खारिज करना और संविदा नियुक्तियों के जरिए संविधानिक प्रावधानों को दरकिनार करना संस्थागत भेदभाव को दर्शाता है। वर्ष 2025 की एक संसदीय समिति ने स्पष्ट किया कि ऐसी प्रक्रियाएं वंचित समुदायों के लिए बनाए गए सुरक्षा उपायों को कमजोर करती हैं।


एसडीपीआई तत्काल जवाबदेही की मांग करता है। सरकार को पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया लागू करनी चाहिए, यूजीसी की निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए और नियमों का पालन न करने वाले विश्वविद्यालयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। ओबीसी (40%), एससी (31%) और एसटी (37%) के फैकल्टी पदों की समग्र रिक्ति दर न केवल छात्रों को विविध शैक्षणिक आदर्शों से वंचित करती है, बल्कि बहिष्कार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है। यह संस्थागत भेदभाव है, जो ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के लिए उनके संवैधानिक प्रतिनिधित्व के अधिकार को छीनता है। एसडीपीआई जातिगत जनगणना की मांग करता है ताकि इन असमानताओं को उजागर कर उन्हें दूर किया जा सके।


हम वंचित समुदायों के साथ खड़े हैं और उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय की बहाली तक संघर्ष जारी रखेंगे। सरकार को तुरंत इन पदों को भरने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए और अपने संवैधानिक दायित्वों का सम्मान करना चाहिए।