
19 वर्षों का अन्याय यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता: एसडीपीआई
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया 21 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा 2006 मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट मामले में बरी किए गए 12 निर्दोष व्यक्तियों के साथ पूर्ण एकजुटता प्रकट करती है। 19 वर्षों की गलत कैद के बाद आया यह निर्णय महाराष्ट्र एंटी-टेररिज़्म स्क्वाड (एटीएस) द्वारा रचे गए न्याय के भयावह अपहरण को उजागर करता है, जिसे विभिन्न सरकारों ने सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के चलते कानून के राज पर हावी होने दिया।
हाईकोर्ट के फैसले ने अभियोजन पक्ष की “पूर्ण विफलता” की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एटीएस ने एमसीओसीए के तहत जबरन कुबूलनामों, अविश्वसनीय गवाहों की गवाही और जैसे-तैसे सील किए गए आरडीएक्स जैसे साक्ष्यों पर भरोसा किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि कुबूलनामे “कॉपी-पेस्ट” किए गए थे और वे कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं थे, जबकि कई गवाह ऐसे थे जो अन्य मामलों में भी गवाही दे चुके थे। इतना ही नहीं, इंडियन मुजाहिदीन के कुबूलनामों जैसे विश्वसनीय सुरागों को जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया, ताकि आरोपियों—जो सभी मुस्लिम थे—को पाकिस्तान से जोड़ते हुए एक झूठा नैरेटिव खड़ा किया जा सके।
यह कोई एकमात्र मामला नहीं है। 2006 और 2008 के मालेगांव विस्फोट मामलों की तरह, मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद मामलों में टारगेट करने का एक पैटर्न सामने आता है, जो खासकर एटीएस जैसे संस्थानों में मौजूद संस्थागत सांप्रदायिकता को दर्शाता है। भाजपा शासित सरकारों ने इस अन्याय को और गहरा किया है, खासकर हिंदू अतिवादी आतंक की जांचों को कमजोर करके। 2008 मालेगांव केस में हेमंत करकरे द्वारा शुरू की गई सबूत-आधारित जांच को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया गया। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित जैसे आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जबकि पीड़ित अब भी न्याय की बाट जोह रहे हैं। 2007 समझौता एक्सप्रेस विस्फोट मामले में सभी आरोपियों की रिहाई, जबकि ठोस जांच सुराग मौजूद थे, इस दोहरे मापदंड को और स्पष्ट करती है। 2006 विस्फोटों की प्रारंभिक जांच के दौरान सत्तासीन कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी इस अन्याय में समान रूप से दोषी है। उनकी अक्षमता ने एटीएस को टॉर्चर, झूठे सबूत और सांप्रदायिक प्रोफाइलिंग जैसे हथकंडों को बिना डर अपनाने की खुली छूट दी।
एसडीपीआई महाराष्ट्र की भाजपा सरकार द्वारा हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के फैसले की कड़ी निंदा करती है। 19 साल की अन्यायपूर्ण कैद झेल चुके निर्दोषों की रिहाई को पलटना उसी अन्याय को दोहराना होगा। हम मांग करते हैं कि बरी किए गए सभी व्यक्तियों को तत्काल मुआवजा और पुनर्वास मिले, और एटीएस की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच कराई जाए। आतंकवाद विरोधी जांच में मौजूद सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को समाप्त करने के लिए संरचनात्मक सुधार बेहद आवश्यक हैं।
एडवोकेट शरफ़ुद्दीन अहमद
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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