
टीपू और हैदर को पाठ्यक्रम में बहाल करे एनसीईआरटी: बीएम कांबले
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बीएम कांबले ने एनसीईआरटी की हालिया संशोधित कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक Exploring Society: India and Beyond – Part 1 में टीपू सुल्तान, हैदर अली और ऐंग्लो-मैसूर युद्धों (1767–1799) को जानबूझकर हटाए जाने की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक बहिष्करण भारत के उपनिवेशवाद विरोधी इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण भारत की निर्णायक भूमिका को हाशिये पर डाल देता है।
ठीक एक दिन पहले एसडीपीआई ने मुगलों को केवल क्रूर शासक के रूप में पेश करने और उनके सांस्कृतिक योगदान की उपेक्षा के लिए एनसीईआरटी की आलोचना की थी। अब टीपू सुल्तान और हैदर अली जैसे दो महत्वपूर्ण मुस्लिम शासकों को बाहर कर देने से यह और स्पष्ट हो जाता है कि इतिहास को धार्मिक चश्मे से देख कर गढ़ा जा रहा है। सवाल यह उठता है — क्या इतिहास को सांप्रदायिक नजरिये से फ़िल्टर किया जा रहा है?
पहले की एनसीईआरटी की किताबें, जैसे Our Pasts–III, में हैदर अली के सैन्य नेतृत्व, टीपू सुल्तान द्वारा मैसूरी रॉकेटों के अग्रणी उपयोग और 1799 में श्रीरंगपट्टणम की लड़ाई तक ब्रिटिश विस्तारवाद के विरुद्ध उनके साहसी संघर्ष का विस्तृत विवरण मौजूद था। LearnCBSE (2 अक्टूबर 2019) और Vedantu (25 नवंबर 2021) जैसे शैक्षणिक प्लेटफॉर्म्स ने भी टीपू को उपनिवेशवाद विरोधी प्रतिरोध का एक सशक्त प्रतीक बताया था।
नई पाठ्यपुस्तक अब प्लासी की लड़ाई और उत्तर भारत के विद्रोहों जैसे सन्यासी-फकीर आंदोलन और संथाल विद्रोहों पर ध्यान केंद्रित करती है। वहीं एक अलग अध्याय में मराठा प्रतिरोध को महिमामंडित किया गया है, जिससे उत्तर भारत केंद्रित इतिहास की प्रवृत्ति और मजबूत हो जाती है। मुगलों को विकृत ढंग से प्रस्तुत करने के साथ यह एक खतरनाक और पूर्वग्रहपूर्ण दृष्टिकोण को उजागर करता है। किताब के विकास के प्रभारी मिशेल डेनिनो का कहना है कि मैसूर प्रतिरोध समेत विस्तृत औपनिवेशिक इतिहास को कक्षा 9 से 12 में शामिल किया जाएगा, परंतु कक्षा 8 में इससे पूरी तरह बाहर करना कोई तर्कसंगत निर्णय नहीं है।
इतिहास से टीपू और हैदर को हटाने से स्वतंत्रता संग्राम की विकृत और अधूरी समझ विकसित होगी—जो मराठा और उत्तर भारत के आख्यानों को प्राथमिकता देती है और मैसूर के योगदान को हाशिये पर डालती है। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत पाठ्यक्रम में लाए जा रहे बदलावों की बड़ी योजना का हिस्सा प्रतीत होता है, जो समावेशिता का दावा करते हुए भी इतिहास को हिंदू-केंद्रित दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रही है।
एसडीपीआई मांग करती है कि एनसीईआरटी तत्काल टीपू सुल्तान और ऐंग्लो-मैसूर युद्धों को पूर्ववर्ती अनुमोदित पाठ्यसामग्री के आधार पर पाठ्यक्रम में बहाल करे। हम एनसीईआरटी से अपील करते हैं कि वह निष्पक्ष और विशेषज्ञ इतिहासकारों की पारदर्शी समिति बनाकर इन विकृतियों को ठीक करे। हम शिक्षकों और नागरिकों से आह्वान करते हैं कि इस ऐतिहासिक पुनर्लेखन का विरोध करें और हमारे बहुलतावादी विरासत की रक्षा करें। भारत की शिक्षा व्यवस्था को अपने अतीत की पूरी विविधता को प्रतिबिंबित करना चाहिए।
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