
राज्यसभा नामांकनों में संवैधानिक मूल्यों को कमजोर कर रही है एनडीए: पी अब्दुल मजीद फैज़ी
सोषल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव पी अब्दुल मजीद फैज़ी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राज्यसभा के लिए उज्ज्वल निकम, हर्षवर्धन श्रृंगला, सी. सदानंदन मास्टर और मीनाक्षी जैन के नामांकन को चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि भले ही ये नामांकित व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 84 के अंतर्गत बुनियादी पात्रता को पूरा करते हैं, लेकिन अनुच्छेद 80(3) के तहत उनका चयन भारतीय जनता पार्टी या उसकी वैचारिक संरचना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकटता के आधार पर किया गया है, न कि साहित्य, विज्ञान, कला या सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में निष्पक्ष विशेषज्ञता के आधार पर। इससे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
उज्ज्वल निकम का नामांकन विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि उनकी कुछ पूर्ववर्ती गतिविधियाँ राज्यसभा जैसे मंच की अपेक्षित निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मुकदमे के दौरान उन्होंने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने आरोपियों द्वारा बिरयानी की मांग की झूठी कहानी गढ़ी थी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई। इसके अतिरिक्त, 1993 मुंबई धमाकों जैसे मामलों में उनकी मीडिया में बार-बार उपस्थिति से यह धारणा बनती है कि वे प्रचार की तलाश में रहते हैं। 2024 में वे बीजेपी के टिकट पर मुंबई उत्तर मध्य लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन असफल रहे—जिससे यह स्पष्ट है कि उनका नामांकन स्वतंत्र विधिक विशेषज्ञता नहीं बल्कि राजनीतिक निष्ठा का इनाम है। 2024 के बदलापुर यौन उत्पीड़न मामले में, बीजेपी से जुड़ाव को लेकर विरोध के बावजूद उन्हें विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया गया, जिससे उनकी निष्पक्षता पर और संदेह उत्पन्न होता है।
हर्षवर्धन श्रृंगला, सेवानिवृत्त राजनयिक और पूर्व विदेश सचिव, अपने कार्यकाल के बाद भाजपा से जुड़ गए। उनका नामांकन यह दर्शाता है कि एनडीए स्वतंत्र विशेषज्ञों की जगह राजनीतिक निष्ठावान व्यक्तियों को प्राथमिकता दे रही है, जो संविधान में उल्लेखित निष्पक्ष सामाजिक सेवा के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उनके द्वारा सेवानिवृत्ति के बाद की गई कोई स्वतंत्र सार्वजनिक सेवा उल्लेखनीय नहीं रही है, जिससे उनकी निष्पक्ष भूमिका पर संदेह होता है।
सी. सदानंदन मास्टर का नामांकन और भी चिंताजनक है, क्योंकि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कन्नूर ज़िले के पूर्व बौद्धिक प्रमुख और सहकार्यवाहक रह चुके हैं। उनके कार्यकाल के दौरान यह क्षेत्र राजनीतिक हिंसा का केंद्र रहा। उनकी आरएसएस पृष्ठभूमि एक विभाजनकारी एजेंडे को बढ़ावा देती है, जिसका उद्देश्य केरल में चुनावी समर्थन मजबूत करना है, न कि सामाजिक सेवा में विशिष्टता प्रदर्शित करना। उनके द्वारा आरएसएस से संबद्ध राष्ट्रीय शिक्षक संघ के अध्यक्ष के रूप में निभाई गई भूमिका ही उनके नामांकन का मुख्य आधार प्रतीत होती है, जो संविधान में उल्लिखित निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
मीनाक्षी जैन की इतिहास लेखन शैली, विशेषकर उनकी पुस्तक सती, पर यह आरोप लगे हैं कि उन्होंने दस्तावेज़ों में प्रमाणित प्रथाओं को जानबूझकर नजरअंदाज़ किया, जिससे भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडे को बल मिला। अयोध्या विवाद और हिंदू मंदिर परंपराओं पर उनके कार्य से यह आशंका और गहराती है कि उनका नामांकन शैक्षणिक और नीति स्तर पर सांस्कृतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिए किया गया है, न कि विविधता आधारित बहुलतावादी संवाद को प्रोत्साहन देने के लिए। महिला होने के बावजूद उनका चयन राज्यसभा में लिंग और समुदायगत प्रतिनिधित्व को पर्याप्त रूप से नहीं दर्शाता।
बीजेपी-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की यह अपारदर्शी नामांकन प्रक्रिया बिना किसी सार्वजनिक विमर्श के की गई, जिसमें हाशिए पर खड़े समुदायों और साहित्य व विज्ञान जैसे क्षेत्रों की पूरी तरह से अनदेखी की गई है। यह चयन राजनीतिक संरक्षण को प्राथमिकता देता है, न कि निष्पक्ष विशेषज्ञता को।
एसडीपीआई एक पारदर्शी और समावेशी प्रक्रिया की मांग करती है, जो संवैधानिक भावना के अनुरूप हो और जिसमें विविधता, निष्पक्षता और स्वतंत्र विशेषज्ञता को प्राथमिकता दी जाए।
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