धुबरी, असम में बेदखली अभियान: कॉरपोरेट मुनाफे के लिए नागरिक अधिकारों को रौंद रही है बीजेपी सरकार

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव इल्यास मोहम्मद थुम्बे ने असम सरकार द्वारा धुबरी ज़िले में चलाए गए हालिया बेदखली अभियान की कड़ी निंदा की है। यह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक राज्य प्रायोजित आक्रामकता है, जिसके तहत हज़ारों बांग्लाभाषी परिवारों को तथाकथित सरकारी ज़मीन की वापसी के नाम पर उजाड़ दिया गया है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा के नेतृत्व में चलाया गया यह ऑपरेशन न्याय, समानता और मानवता जैसे हिंदुस्तान के संविधान में निहित सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है, जो धर्म की परवाह किए बिना हाशिये पर खड़ी आबादियों को असमान रूप से प्रभावित करता है।

8 जुलाई, 2025 को, असम प्रशासन ने धुबरी के चापर राजस्व सर्कल में एक विशाल अभियान चलाया, जिसमें 1,200 से अधिक सुरक्षा बलों और 50 से अधिक खुदाई मशीनों की तैनाती की गई। इस अभियान के तहत चारुवाबखरा, संतोषपुर और चिराकुटा गांवों में लगभग 3,500 बीघा ज़मीन खाली कराई गई, जिससे 1,069 से लेकर 2,000 तक परिवारों को बेघर कर दिया गया—इनमें से कई परिवार पिछले चार दशकों से इन ज़मीनों पर रहकर खेती-किसानी के ज़रिए अपना जीवन यापन कर रहे थे। सरकार द्वारा ‘कानूनी प्रक्रिया के पालन’ का दावा खोखला प्रतीत होता है—परिवारों को अक्सर सिर्फ कुछ दिन पहले ही सूचना दी गई, और जिन कुछ लोगों को मुआवज़ा मिला भी, उन्हें मात्र ₹50,000 की अल्प सहायता दी गई, जो घर, आजीविका और गरिमा के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती।

जब इन परिवारों ने अपने जीवन की नींव बचाने के लिए प्रतिरोध किया, तो राज्य ने जवाब में लाठीचार्ज, आंसू गैस और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी का सहारा लिया। इनमें राइजोर दल के अखिल गोगोई और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के आठ विधायक शामिल हैं, जो पीड़ितों के साथ एकजुटता जताने पहुंचे थे।

मुख्यमंत्री सरमा द्वारा इन बेदखलियों को “स्थानीय जनसंख्या का संतुलन बहाल करने” और “अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को हटाने” की आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करना, एक भ्रामक और विभाजनकारी प्रचार है। इससे असम में वर्षों से बसे, विभिन्न धर्मों के बांग्लाभाषी हिंदुस्तानी नागरिकों को बाहरी बताकर पूरे समुदाय को कलंकित किया जा रहा है। यह भाषणबाज़ी देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने वाली है और केवल राजनीतिक लाभ के लिए साम्प्रदायिक तनाव को हवा देती है।

2021 से अब तक, असम सरकार ने 25,000 एकड़ से अधिक ज़मीन को ‘रिक्लेम’ किया है, जिनमें धुबरी, गोलपाड़ा और लखीमपुर जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र विशेष रूप से निशाने पर रहे हैं—पुनर्वास और न्यायिक प्रक्रिया की घोर अनदेखी के साथ। यह शासन का एक ख़तरनाक पैटर्न है, जो समावेशन की जगह बहिष्करण को बढ़ावा देता है।

इस अन्याय को और गंभीर बनाती हैं वे खबरें, जिनके अनुसार खाली कराई गई ज़मीन पर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए कॉरपोरेट हित, विशेषकर अदानी, को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे यह गंभीर आशंका उत्पन्न होती है कि यह विस्थापन सार्वजनिक हित के बजाय निजी कंपनियों की सेवा में किया गया है। भले ही गुवाहाटी हाईकोर्ट ने प्रभावित परिवारों की 130 याचिकाएं खारिज कर दी हों, राज्य की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनी रहती है कि वह इन नागरिकों को पुनर्वास की ठोस योजना दे। पर्याप्त मुआवज़ा और पुनर्वास के अभाव में यह पूरी कार्रवाई अमानवीय और निर्मम बन जाती है।

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया, धुबरी के बेदखल परिवारों के साथ पूरी मज़बूती से खड़ी है और इस गंभीर अन्याय की तुरंत भरपाई की मांग करती है। जब तक हर प्रभावित परिवार को न्यायोचित मुआवज़ा, वैकल्पिक ज़मीन और आजीविका पुनर्निर्माण का पूरा समर्थन नहीं मिल जाता, तब तक सभी बेदखली अभियानों पर तुरंत रोक लगाई जाए। मुख्यमंत्री सरमा को विभाजनकारी बयानबाज़ी छोड़कर ऐसे शासन की ओर बढ़ना चाहिए जो भाषा, धर्म या जाति की परवाह किए बिना सभी नागरिकों की गरिमा और अधिकारों की रक्षा करे—जैसा कि हिंदुस्तान के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है।