
कीलाड़ी: संघ परिवार द्वारा हिंदुस्तानी इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिशों का विरोध करें
तमिलनाडु के शिवगंगा ज़िले में स्थित प्राचीन सभ्यता के कीलाड़ी स्थल पर चल रही पुरातात्विक खुदाई को रोकने के लिए केंद्र सरकार के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के शीर्ष अधिकारी प्रयासरत हैं। डॉ. अमरनाथ रामकृष्ण के नेतृत्व में इस स्थल पर की जा रही वैज्ञानिक पड़ताल की रिपोर्ट को संशोधित करने का दबाव बनाया गया। जब उन्होंने ऐसा करने से इनकार किया, तो उन्हें असम स्थानांतरित कर दिया गया।
कीलाड़ी में वैगई नदी के किनारे एक प्राचीन नगरीय सभ्यता की खोज ने संघ परिवार की विचारधारा को झकझोर दिया है, क्योंकि ये वैज्ञानिक प्रमाणों से युक्त खोजें उस झूठे ऐतिहासिक विमर्श को ध्वस्त कर देती हैं जिसे वाजपेयी सरकार के समय से ही केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों पर दबाव बनाकर स्थापित किया जा रहा है। इस विकृत इतिहास में वैदिक और ब्राह्मणवादी परंपराओं को हिंदुस्तानी इतिहास और संस्कृति का केंद्रबिंदु बताया गया, और यह दावा भी किया गया कि आर्य हिंदुस्तान के ही मूल निवासी थे और बाहर से नहीं आए थे, जैसा कि सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद हुआ था।
इस पूरे प्रयास के पीछे राजनीतिक उद्देश्य यह था कि “हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान” के नारे को एक ऐतिहासिक आधार दिया जा सके। इस दिशा में उन्होंने रोमिला थापर जैसे धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों को निशाना बनाया, जो इस झूठे विमर्श का विरोध करते थे, और इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस जैसी संस्थाओं पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। उन्होंने इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च (ICHR) को भी अपने अनुसार चलाने पर मजबूर किया।
इतिहास के क्षेत्र में यह लड़ाई वर्षों से चल रही है। इस विकृत इतिहास की सबसे दुखद कड़ियों में से एक थी बाबरी मस्जिद का विध्वंस, जिसे इस दावे के आधार पर गिरा दिया गया कि वह उसी स्थान पर बनी थी जहां भगवान राम का जन्म हुआ था—एक ऐसा दावा जो इतिहास या पुरातत्व में प्रमाणित नहीं है। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थल पर हिंदू पक्ष के दावे को सबूतों के आधार पर नहीं, बल्कि आस्था के आधार पर मान्यता दे दी।
अब कीलाड़ी में चल रही जांचें उनके इस वैदिक-केन्द्रित इतिहास के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं, जिसमें पूरे हिंदुस्तान की सांस्कृतिक परंपराओं को गंगा-यमुना क्षेत्र की हिंदू वैदिक संस्कृति के अधीन दिखाया गया था। कीलाड़ी में शोधकर्ताओं को ऐसी नगरीय सभ्यता के प्रमाण मिले हैं, जो सिंधु घाटी सभ्यता के समय की है। यहाँ से प्राप्त तमिल ब्राह्मी लेख, मिट्टी के बर्तन, कुएँ, जल निकासी प्रणाली और अन्य पुरावशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि दक्षिण हिंदुस्तान में वैदिक युग से भी पहले एक उन्नत सभ्यता मौजूद थी, जो संभवतः सिंधु घाटी से गहराई से जुड़ी थी।
कीलाड़ी की यह प्राचीनता और उसका सिंधु सभ्यता से जुड़ाव, हिंदुस्तानी इतिहास में आर्यों की श्रेष्ठता के हिंदुत्ववादी दावे पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अब वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ दक्षिण हिंदुस्तान की द्रविड़ संस्कृति की प्राचीनता प्रमाणित हो रही है। यह संघ परिवार के लिए उनकी विचारधारा की नींव को हिला देने वाली सच्चाई है। इसी कारण वे इन खोजों की आधिकारिक रिपोर्टों को रोकने और इनमें लगे विद्वानों को प्रताड़ित करने के प्रयास कर रहे हैं।
यह सच है कि ऐसे प्रयास सत्य को अंततः सामने आने से नहीं रोक सकते, लेकिन यह ज़रूर उजागर करते हैं कि संघ परिवार की विचारधारा कितनी खोखली है और उसका इतिहास कितना झूठा है। ऐसे समय में यह बेहद आवश्यक है कि कीलाड़ी में चल रही वैज्ञानिक पड़ताल की रक्षा की जाए और इन स्थलों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाए, ताकि वे हिंदुस्तान का वास्तविक इतिहास जान सकें—ना कि वह झूठा इतिहास जिसे संघ परिवार फैलाने की कोशिश कर रहा है।
यास्मीन फारूक़ी
राष्ट्रीय महासचिव
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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