
बीएम कांबले ने चुनाव आयोग द्वारा सीसीटीवी फुटेज नष्ट करने के फैसले की कड़ी निंदा की
नई दिल्ली, 20 जून 2025: सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बी.एम. कांबले ने चुनाव आयोग (ECI) के उस निर्णय की तीव्र आलोचना की है जिसमें आयोग ने चुनाव परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर सीसीटीवी, वेबकास्टिंग और वीडियो फुटेज को नष्ट करने का आदेश दिया है, यदि उस चुनाव को चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी गई हो। इसके साथ-साथ चुनाव आचरण नियम, 1961 के नियम 93 में किया गया हालिया संशोधन, जिससे इस तरह की रिकॉर्डिंग तक सार्वजनिक पहुंच सीमित हो गई है, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
चुनाव आयोग का यह तर्क कि इन फुटेज का दुरुपयोग एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के माध्यम से “गलत और भ्रामक नैरेटिव” बनाने में किया जा सकता है, बेहद कमजोर और आधारहीन है। सीसीटीवी रिकॉर्डिंग एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक दस्तावेज होती है और उसे इतनी जल्दी नष्ट करना संदेह पैदा करता है कि कहीं चुनावी गड़बड़ियों को छुपाने की कोशिश तो नहीं हो रही।
2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान कई गंभीर आरोप लगे थे, जैसे कि शाम 5 बजे के बाद अचानक 7.83% मतदान बढ़ जाना और मतदाता सूची में संदेहास्पद तरीके से कुछ नामों को जोड़ा जाना। ऐसी स्थिति में सीसीटीवी फुटेज का विश्लेषण इन आरोपों की सच्चाई को उजागर कर सकता था। लेकिन 45 दिनों के भीतर इन रिकॉर्ड्स को खत्म करने से स्वतंत्र जांच का रास्ता बंद हो जाता है, जिससे नागरिकों का चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर होता है।
चुनाव आयोग का यह कहना कि ये रिकॉर्ड केवल ‘आंतरिक प्रबंधन’ के लिए होते हैं, उसके ही पिछले उस रुख का विरोधाभास है जिसमें आयोग ने इन्हें सूचना के अधिकार (RTI) के तहत उपलब्ध कराया था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा अधिक पारदर्शिता का निर्देश दिए जाने के बाद यह नीति परिवर्तन संस्थागत गोपनीयता की मंशा को दर्शाता है।
मलकाजगिरी लोकसभा क्षेत्र का उदाहरण दें तो वहां 84 टेराबाइट्स से अधिक डेटा इकट्ठा किया गया, जिसे बिना किसी स्पष्ट तर्क के नष्ट करने का निर्णय गंभीर चिंता का विषय है। सिर्फ 45 दिनों की सीमा तय कर देना यह मान लेना है कि सभी गड़बड़ियों का उसी अवधि में पता चल जाएगा, जो कि आम नागरिकों के लिए व्यावहारिक नहीं है।
एसडीपीआई की मांग है कि चुनाव आयोग इस फैसले को तुरंत वापस ले, कम से कम एक वर्ष तक वीडियो फुटेज को सुरक्षित रखे और सूचना के अधिकार के तहत नागरिकों को इनकी पहुंच प्रदान करे। साथ ही मतदाता सूचियों और वीडियो रिकॉर्डिंग की स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि जनता का भरोसा बहाल हो सके। लोकतंत्र की बुनियाद पारदर्शिता पर टिकी है—चुनाव आयोग को इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए, ना कि इसे कमजोर करने की।
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