एसडीपीआई ने आतंकी हमले, जेट नुकसान और युद्धविराम समझौते पर सरकार से मांगा जवाब
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हालिया घटनाओं को लेकर मोदी सरकार की पारदर्शिता की कमी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। देश एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है, और ऐसे समय में नागरिकों को स्पष्ट, तथ्यपरक और ईमानदार जानकारी मिलना अत्यंत आवश्यक है।
पहलगाम आतंकी हमले को हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन चारों पहचाने गए हमलावर अभी भी फरार हैं। यह स्थिति न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है, बल्कि यह जानने की आवश्यकता भी पैदा करती है कि अब तक उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं किया जा सका। क्या उन्हें पकड़ने के लिए कोई ठोस रणनीति अपनाई गई है? यदि हां, तो उसकी जानकारी क्यों सार्वजनिक नहीं की गई?
इसके अतिरिक्त, 7 मई को पाकिस्तान के साथ हुई सैन्य झड़पों के दौरान भारतीय वायुसेना के जेट विमानों के नुकसान की पुष्टि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान द्वारा की गई। लेकिन इस स्वीकारोक्ति में न तो खोए गए जेट की संख्या बताई गई, न ही ऑपरेशन “सिंदूर” से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ साझा की गईं। सरकार की यह चुप्पी और अस्पष्टता जनमानस में संदेह और अविश्वास को जन्म देती है। देश को यह जानने का अधिकार है कि इन विफलताओं के पीछे कौन-से कारण थे, और क्या सरकार ने उनसे सबक लिया है?
10 मई को पाकिस्तान के साथ जिस संघर्षविराम की घोषणा की गई, वह भी कई सवालों के घेरे में है। दावा किया जा रहा है कि इस युद्धविराम की मध्यस्थता डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन द्वारा की गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने बार-बार इस दावे का खंडन किया है। यदि यह सत्य नहीं है, तो फिर जनता को यह क्यों नहीं बताया जा रहा कि वास्तव में मध्यस्थता किसके द्वारा की गई? क्या यह संघर्षविराम किसी सौदे के तहत हुआ था? क्या पहलगाम के हमलावरों को न पकड़ना इसी समझौते की कोई शर्त थी? यदि नहीं, तो फिर अब तक वे क्यों फरार हैं?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर न दिए जाने से यह आशंका उत्पन्न होती है कि कहीं भू-राजनीतिक समीकरणों को राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से ऊपर तो नहीं रखा गया। यह स्थिति गंभीर है और देश की जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि कहीं भारत की संप्रभुता से समझौता तो नहीं किया गया।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इन संकटों पर चर्चा के लिए विशेष संसद सत्र बुलाने की मांग को भी सरकार द्वारा लगातार नजरअंदाज किया गया है। लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल गोपनीयता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और पारदर्शिता भी होता है। जब विपक्ष इस पर चर्चा चाहता है, तब सरकार का चुप्पी साध लेना लोकतांत्रिक मूल्यों और जनविश्वास, दोनों का अपमान है, और सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस राष्ट्रीय संकट का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं। रेलवे टिकटों पर उनकी तस्वीरें, और भाजपा के कार्यक्रमों में इस संकट का उपयोग राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जा रहा है। यह अत्यंत निंदनीय है कि एक गंभीर राष्ट्रीय आपदा को एक चुनावी हथियार में बदलने की कोशिश की जा रही है।
एसडीपीआई सरकार से मांग करती है कि वह इस संकट पर स्पष्ट, सटीक और विस्तृत जानकारी तुरंत देश के समक्ष रखे। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में, जवाबदेही कोई विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है। सरकार को चाहिए कि वह विशेष संसद सत्र बुलाकर इन सभी मुद्दों पर खुली बहस की अनुमति दे, ताकि न केवल जनता को सच्चाई पता चले, बल्कि यह भी सुनिश्चित हो कि भविष्य में ऐसी लापरवाहियाँ न दोहराई जाएँ।
मोहम्मद शफी
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI)

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