65 लाख बहिष्कृत मतदाताओं के नाम तुरंत प्रकाशित करें
बहिष्कृत मतदाताओं की सूची जारी करने से चुनाव आयोग का इनकार जवाबदेही से बचने की कमजोर दलील है

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के राष्ट्रीय महासचिव इलियास मुहम्मद थुम्बे ने बिहार के प्रारंभिक मतदाता सूची (ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल) से 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की सूची को सार्वजनिक करने से चुनाव आयोग के इनकार की कड़ी निंदा की है। यह इनकार 9 अगस्त, 2025 को सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल उनके हलफ़नामे में सामने आया, जो कि विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के पहले चरण के बाद हुआ है। यह बेहिसाब गोपनीयता लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 326 में निहित मतदान के मौलिक अधिकार पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग का यह तर्क कि वह कानूनन नाम या बहिष्करण के कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है, जवाबदेही से बचने का खोखला बहाना है और इससे यह गंभीर संदेह पैदा होता है कि यह हाशिये पर पड़े समुदायों को निशाना बनाकर मताधिकार से वंचित करने की सुनियोजित साजिश है।

एसडीपीआई ने लगातार SIR की मनमानी और बहिष्करणकारी रूपरेखा का विरोध किया है, जैसा कि 30 जून और 9 जुलाई, 2025 को जारी हमारे पूर्व वक्तव्यों में व्यक्त किया गया था। 2.93 करोड़ मतदाताओं से कड़े दस्तावेज़ी प्रमाण प्रस्तुत करने की मांग—जिसमें आमतौर पर उपलब्ध आधार और वोटर आईडी को मान्यता नहीं दी गई—दलितों, मुसलमानों, प्रवासी मज़दूरों और महिलाओं पर असमान रूप से बोझ डालती है, जिनके पास इस तरह के दस्तावेज़ अक्सर उपलब्ध नहीं होते। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि बिहार की केवल 2.8% आबादी के पास जन्म प्रमाणपत्र है, जिससे यह प्रक्रिया स्पष्ट रूप से मताधिकार छीनने की सुनियोजित बाधा बन जाती है। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी के बावजूद चुनाव आयोग द्वारा बहिष्कृत मतदाताओं की सूची जारी न करना पारदर्शिता का मज़ाक उड़ाता है और विपक्षी नेताओं व नागरिक समाज की उस आशंका को बल देता है कि यह परोक्ष रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने की कोशिश है।

हम चुनाव आयोग से मांग करते हैं कि वह तुरंत 65 लाख बहिष्कृत मतदाताओं के नाम और उनके बहिष्करण के विस्तृत कारण सार्वजनिक करे, जैसा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (1995) जैसे फैसलों में स्थापित किया गया है। बिहार में मानसून और उच्च प्रवासन के बीच जल्दबाज़ी में बनाई गई समयसीमा यह स्पष्ट करती है कि आगामी नवंबर 2025 विधानसभा चुनावों से पहले संवेदनशील समूहों को मताधिकार से वंचित करने की मंशा है। आयोग के हलफ़नामे में इन चिंताओं को नकारना और ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ जैसे याचिकाकर्ताओं पर “दुर्भावना” का आरोप लगाना चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा और कमज़ोर करता है।

एसडीपीआई SIR प्रक्रिया पर तत्काल रोक, आधार और राशन कार्ड को मान्य प्रमाण के रूप में शामिल करने, तथा समयसीमा बढ़ाने की मांग करता है ताकि कोई भी पात्र मतदाता बहिष्कृत न हो। हम सर्वोच्च न्यायालय से अपील करते हैं कि वह चुनाव आयोग को जवाबदेह ठहराए और बिहार के नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करे। एसडीपीआई बिहार के लोगों के साथ खड़ा है और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की पवित्रता को बचाने के लिए इस अलोकतांत्रिक कदम के ख़िलाफ़ संघर्ष जारी रखेगा।