2024 लोकसभा चुनावों में व्यापक वोटर फ्रॉड पर एसडीपीआई ने की न्यायिक जांच की मांग

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मोहम्मद शफी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में कथित बड़े पैमाने पर मतदाता धोखाधड़ी पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है और इसकी कड़े शब्दों में निंदा की है। यह खुलासा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा किया गया है। एसडीपीआई इन खुलासों को केवल प्रक्रियात्मक चूक नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर एक संगठित, सुनियोजित हमला मानती है, जो बूथ कैप्चरिंग, धांधली और राजनीतिक गुंडागर्दी के समान है। पार्टी का मानना है कि भारत का चुनाव आयोग, जिसे निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने का संवैधानिक दायित्व सौंपा गया है, अपनी निष्पक्षता निभाने में विफल रहा है, जिससे लोकतंत्र को कमजोर करने में उसकी भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं।

कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र, जो बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, में कांग्रेस पार्टी द्वारा छह महीने तक की गई गहन पड़ताल में 6.5 लाख मतदाता प्रविष्टियों का विश्लेषण किया गया। इस जांच में 1,00,250 फर्जी वोटों का खुलासा हुआ है, जिसने भाजपा को महज़ 32,707 मतों के अंतर से जीत दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई हो सकती है। इनमें से 11,965 मतदाता डुप्लीकेट पाए गए, जबकि 40,009 पते ऐसे निकले जिन्हें सत्यापित नहीं किया जा सका — इनमें से कई शराब की भट्ठियों जैसी व्यावसायिक संपत्तियां आवासीय पते के रूप में दर्ज थीं। इसके अलावा, 10,452 मतदाता एक ही पते पर समूह में पंजीकृत थे, 4,132 मतदाता फोटो अमान्य पाए गए और 33,692 बार फ़ॉर्म-6 का दुरुपयोग किया गया। इसके अतिरिक्त, कई मतदाता अलग-अलग मतदान केंद्रों पर विभिन्न ईपीआईसी नंबरों के साथ पंजीकृत पाए गए। वृद्ध नागरिकों का भी महीनों के भीतर दो बार नए मतदाता के रूप में पंजीकरण दर्शाना इस बात का प्रमाण है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई सुनियोजित धांधली थी। महाराष्ट्र में भी इसी प्रकार की गड़बड़ियां सामने आई हैं, जहां लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच 1 करोड़ नए मतदाता जोड़े गए, जो देशव्यापी चुनावी अनियमितताओं का संकेत देता है।

चुनाव आयोग द्वारा पिछले दस वर्षों से मशीन-रीडेबल वोटर डेटा और सीसीटीवी फुटेज जारी न करना और राहुल गांधी के आरोपों को खारिज कर देना उसकी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आयोग का यह दावा कि मतदाता सूची तक पारदर्शी पहुंच उपलब्ध है, खोखला साबित होता है, जब हम देखते हैं कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के अंतर्गत केवल आठ चुनाव याचिकाएं दायर की गईं। यह स्पष्ट करता है कि मतदाता धोखाधड़ी जैसे मामलों के लिए कानूनी विकल्प अत्यंत सीमित हैं। एसडीपीआई इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक सिद्धांत के साथ विश्वासघात मानती है, जो भारत के लोकतंत्र के खिलाफ एक गंभीर अपराध है।

एसडीपीआई मांग करती है कि इन आरोपों की तत्काल सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच कराई जाए ताकि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में चुनावी प्रक्रिया संदिग्ध रही है, वहां पूरी जांच हो सके। यदि चुनाव आयोग के किसी अधिकारी या किसी राजनेता की संलिप्तता सामने आती है तो उनके विरुद्ध सख्त सज़ा दी जाए। साथ ही जिन क्षेत्रों में मतदाता धोखाधड़ी प्रमाणित हो, वहां दोबारा चुनाव कराए जाएं ताकि जनता का विश्वास बहाल हो सके। पार्टी राहुल गांधी की उस मांग का समर्थन करती है जिसमें उन्होंने डिजिटल वोटर डेटा सार्वजनिक करने की बात कही है, जिससे तेज़ और स्वतंत्र सत्यापन संभव हो सके, क्योंकि 97 करोड़ मतदाताओं की मैन्युअल जांच व्यावहारिक नहीं है।

एसडीपीआई यह संकल्प लेती है कि वह पूरे देश में लोकतांत्रिक ताकतों और जनमत को संगठित करके इस चुनावी तंत्र के आपराधिकरण के खिलाफ संघर्ष करेगी। हम सभी नागरिकों से अपील करते हैं कि वे सड़कों पर उतरें, जवाबदेही की मांग करें और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखने के लिए देशव्यापी मतदाता सूची की जांच की मांग करें। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत इस तरह की सुनियोजित चुनावी धोखाधड़ी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, जो जनता की इच्छा और संविधान दोनों का अपमान है।