
130वाँ संविधान संशोधन: संघवाद और न्याय व्यवस्था पर हमला
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव इलयास मुहम्मद थुम्बे ने लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा प्रस्तुत संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025, सरकार प्रशासनिक प्रदेश (संशोधन) विधेयक, 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 की कड़े शब्दों में निंदा की है। ये विधेयक लोकतंत्र, संघवाद और क़ानून के शासन पर खुला हमला हैं। ये कुछ और नहीं बल्कि भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के हाथों में तानाशाही सत्ता को केंद्रीकृत करने के औज़ार हैं, जो चुने हुए जनप्रतिनिधियों के अधिकारों और जनता की इच्छा को कुचलते हैं।
इन विधेयकों के मूल में वह धारणा छिपी है जिसमें बिना दोष सिद्धि के ही दोषी मान लिया जाता है। संविधान में निहित “दोष सिद्ध होने तक निर्दोष” की मूलभूत अवधारणा को यह विधेयक पलट देता है। केवल पाँच वर्ष की सज़ा वाली धाराओं में गिरफ्तारी पर, 30 दिन की हिरासत पूरी होते ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को स्वतः पद से हटाने का प्रावधान, बिना मुक़दमे या न्यायिक प्रक्रिया के, न्याय की खुली अवहेलना है। यह सुधार नहीं बल्कि न्याय का उपहास है, जहाँ केवल आरोप लग जाने से ही करोड़ों मतदाताओं द्वारा चुने गए नेताओं की अयोग्यता तय हो जाएगी।
ऐसे प्रावधानों का आसानी से दुरुपयोग कर विपक्षी सरकारों को गिराया जा सकता है। ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का भाजपा द्वारा पहले ही बार-बार राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। बीते दशक में विपक्षी नेताओं पर दर्ज 193 ईडी मामलों में केवल 2 में ही दोषसिद्धि हुई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अधिकांश मामले राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित हैं। यह संशोधन केंद्र और उसके राज्यपालों को न्यायपालिका को दरकिनार कर सीधे न्यायाधीश, अभियोजक और जल्लाद की भूमिका में ला खड़ा करता है। यह लोकतंत्र की जड़ें काटकर भारत को पुलिस राज्य में बदलने का मार्ग प्रशस्त करता है।
एसडीपीआई ने लगातार भाजपा की निरंकुश प्रवृत्तियों को उजागर किया है—चाहे सुप्रीम कोर्ट पर हमला हो या एजेंसियों का दुरुपयोग। यह विधेयक उसी एजेंडे की अगली कड़ी है, जो तानाशाही व्यवस्थाओं की याद दिलाता है जहाँ हिटलर का एनैबलिंग एक्ट जैसे क़ानूनों ने संवैधानिक सुरक्षा को ध्वस्त कर दिया था। यह विशेष रूप से विपक्ष शासित राज्यों और अल्पसंख्यक नेतृत्व वाली पार्टियों को निशाना बनाता है, जिससे न्याय और समानता की आवाज़ और हाशिए पर चली जाएगी।
एसडीपीआई इन अलोकतांत्रिक विधेयकों की तत्काल वापसी की माँग करती है। ये लोकतंत्र की सुरक्षा को कमज़ोर करते हैं और भाजपा की हताशा को उजागर करते हैं, जो चुनावी धांधली और गिरती जनवैधता से घिर चुकी है। हम प्रगतिशील ताक़तों, क्षेत्रीय दलों और नागरिक समाज से अपील करते हैं कि वे इस भारतीय लोकतंत्र के काले दिन के ख़िलाफ़ एकजुट हों।
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