हज़रतबाल विवाद भाजपा की दोहरी नीति का खुलासा

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एडवोकेट शर्फ़ुद्दीन अहमद ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल प्रशासन की हालिया कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की है, जो सीधे तौर पर मोदी सरकार के नियंत्रण में काम कर रहा है। यह कार्रवाई किसी संतुलित प्रशासनिक सोच से नहीं, बल्कि एक उकसाने वाली मानसिकता से प्रेरित प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य घाटी की नाज़ुक शांति को भंग करना, समुदायों को बांटना और राजनीतिक लाभ के लिए असंतोष भड़काना है।

हज़रतबाल हमेशा से धार्मिक प्राधिकरण की सर्वोच्च सीटों में से एक रहा है, जिसे संविधान में अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों की पूर्ण गारंटी प्राप्त है। इस प्रकार की दखलंदाज़ी न केवल अनावश्यक है बल्कि जानबूझकर साम्प्रदायिक खाई चौड़ी करने की कोशिश है, जिससे असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है और साथ ही कश्मीर विरोधी ताक़तों को बढ़ावा देकर देश के अन्य हिस्सों में चुनावी फायदे हासिल करने का रास्ता बनाया जा रहा है।

हज़रतबाल दरगाह में, मस्जिद के भीतर अशोक सिंह स्तंभ की प्रतिकृति लगाए जाने से इबादत करने वालों की भावनाएँ गहराई से आहत हुई हैं। मस्जिद जैसे पवित्र स्थान में पशु आकृति वाले प्रतीकों का होना इस्लामी उसूलों के खिलाफ़ है, जहाँ किसी भी तरह की मूर्त या जीव-जंतु की छवि की मनाही है। यह महज़ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि धार्मिक स्थल पर राज्य के प्रतीकों को थोपने की सुनियोजित कोशिश है। 5 सितम्बर को उपजे आक्रोश को राजनीतिक साज़िश कहना ग़लत है, क्योंकि यह लोगों की पवित्र आस्थाओं के अपमान के खिलाफ़ स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। इन आहत भावनाओं को “आतंकवाद” कहना अन्यायपूर्ण और भड़काऊ है।

इस ग़लती की ज़िम्मेदारी जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड पर है, जो 2022 से भाजपा नेता डॉ. दरख़्शां अंद्राबी के नेतृत्व में काम कर रहा है। धार्मिक संस्थानों की हिफ़ाज़त करने के बजाय यह बोर्ड केंद्र सरकार का राजनीतिक औज़ार बन गया है, जिसने मुस्लिम समुदाय की संवेदनाओं की अनदेखी की है। अंद्राबी द्वारा आम नमाज़ियों को “आतंकवादी” करार देना और पब्लिक सेफ़्टी एक्ट जैसे कठोर क़दम उठाने की माँग करना तनाव को और बढ़ा रहा है। वहीं प्रशासन ने एफआईआर और सामूहिक गिरफ़्तारियों का सहारा लिया है, जिससे जनता की वैध चिंताओं को संबोधित करने के बजाय उन्हें और疎 alienate कर दिया गया है।

और भी चिंताजनक बात यह है कि ऐसे कदम चुनिंदा तौर पर केवल मुस्लिम स्थलों पर उठाए जाते हैं। कहीं यह रिपोर्ट नहीं है कि हिंदू मंदिरों, सिख गुरुद्वारों या ईसाई गिरजाघरों में इस तरह की तख़्तियां लगाई गई हों। मुस्लिम स्थलों को विशेष रूप से निशाना बनाना भेदभावपूर्ण दोहरे मानदंडों को उजागर करता है और यह कश्मीर की मुस्लिम बहुसंख्या को हाशिये पर धकेलने के बड़े एजेंडे की ओर इशारा करता है।

यह विवाद 2019 के बाद के जम्मू-कश्मीर की हक़ीक़त से अलग नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण, सत्ता के केंद्रीकरण, व्यापक अधिकार हरण और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पाबंदियों ने पहले ही गहरे अविश्वास की नींव रख दी है। धार्मिक स्थलों पर सरकारी प्रतीकों को थोपना इस अलगाव को और गहरा करता है।
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया हज़रतबाल प्रकरण के लिए जवाबदेही तय करने, सभी बंदियों की रिहाई और धार्मिक स्थलों से भड़काऊ प्रतीकों को हटाने की माँग करती है। मोदी सरकार को चाहिए कि कश्मीर को साम्प्रदायिक प्रयोगों की प्रयोगशाला बनाना बंद करे और इसकी बहुलतावादी परंपराओं का सम्मान करे। घाटी के लोग गरिमा, न्याय और अमन के हक़दार हैं, न कि उकसावे और दमन के।