सेबी की अडानी को क्लीन चिट: जनविश्वास से किया गया धोखा

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) की राष्ट्रीय महासचिव यास्मीन फारूकी ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों में अडानी समूह को तथाकथित “क्लीन चिट” देने की कड़ी निंदा की है। यह फैसला संस्थागत पक्षपात की बू देता है और आम भारतीयों तथा हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था की कीमत पर चहेते पूंजीपतियों को बचाने का एक सुनियोजित प्रयास है।

सेबी की जांच बेहद सीमित रही। उसने अपने दायरे को केवल FY13 से FY21 के बीच के खुलासों, इनसाइडर ट्रेडिंग और संबंधित-पक्ष लेनदेन तक सीमित रखा, जबकि हिंडनबर्ग द्वारा उजागर की गई बड़ी गड़बड़ियों—जैसे ऑफशोर फंड रूटिंग और शेयरों की कृत्रिम अधिक-कीमत—को सुविधापूर्वक नज़रअंदाज़ कर दिया। ऐसी चयनित जांच यह नहीं समझा सकती कि आखिर कैसे अरबों रुपये का बाज़ार मूल्य मिट गया, जिससे खुदरा निवेशकों और सार्वजनिक फंडों की बचत खत्म हो गई। क्या एक ऐसा नियामक, जो धोखाधड़ी के स्पष्ट सबूतों को टाल दे, कभी भरोसा जगा सकता है?

यह बरी करना मोदी सरकार और अडानी साम्राज्य के बीच गहरे गठजोड़ को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट के बार-बार निर्देशों के बावजूद, सेबी ने जानबूझकर देरी की, महज़ औपचारिक नोटिस जारी किए और अंततः बिना किसी दंड के मामले बंद कर दिए। समय भी संदिग्ध है, क्योंकि इसी दौरान अमेरिका में अडानी के खिलाफ रिश्वतखोरी की जांच चल रही है। क्या सेबी राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है, या फिर एक ऐसे चहेते उद्योग समूह की ढाल बन चुका है, जिसने अधोसंरचना और ऊर्जा क्षेत्रों में नीतिगत रियायतों के सहारे उन्नति की है?

तथाकथित क्लीन चिट ने उन आर्थिक संकटों को भी नज़रअंदाज़ कर दिया है, जो इन आरोपों से उपजे—संसद का ठप होना, निवेशकों का भरोसा डगमगाना और देश को पारदर्शी जांच से वंचित करना। विपक्ष की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) जांच की मांग को लगातार ठुकराया गया, जिससे सरकार का सत्य से भय साफ़ दिखाई देता है।

एसडीपीआई तत्काल जेपीसी जांच, सेबी का ढांचागत पुनर्गठन ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके, और उन सभी से जवाबदेही की मांग करता है, जिन्होंने तथ्यों को दबाकर दोषियों को बचाने का काम किया। हिन्दुस्तान आर्थिक न्याय को राजनीतिक पक्षपात की भेंट नहीं चढ़ा सकता।