वक़्फ़ पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला केंद्र सरकार की मनमानी का कठोर अभियोग; कानून को पूरी तरह रद्द किया जाना चाहिए

वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिका में सर्वोच्च न्यायालय का दिया गया निर्णय, केंद्र सरकार की इस मनमानी का सख़्त अभियोग है, जिसके तहत उसने मुस्लिम समुदाय को उनके महत्वपूर्ण मामलों और हितों के प्रबंधन में न्यूनतम क़ानूनी संरक्षण से भी वंचित करने की कोशिश की।

यह फ़ैसला ऐसे समय आया है जब पहले से ही कई इसी प्रकृति की कार्रवाइयाँ हो चुकी हैं—जैसे नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने के प्रयास, जिसके ज़रिए बड़ी संख्या में मुसलमानों से उनकी नागरिकता छीनने का ख़तरा था; मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया, जिससे मुसलमानों के बड़े हिस्सों को “विदेशी” और “ग़ैरक़ानूनी प्रवासी” बताकर मतदान अधिकार से वंचित किया जा सकता था। इन सबके बीच वक़्फ़ संशोधन अधिनियम को समुदाय को और कमज़ोर करने तथा सैकड़ों वर्षों से उनके पास मौजूद संपत्तियों से उन्हें वंचित करने की एक और कोशिश के रूप में देखा गया। अधिनियम की कई धाराएँ मनमानी और समुदाय के हितों के ख़िलाफ़ मानी गईं और उनकी आलोचना हुई। क़ानूनी विशेषज्ञों और समुदाय के नेताओं ने यह वैध चिंताएँ उस वक़्त से ही उठाई थीं जब यह विधेयक गृहमंत्री द्वारा संसद में पेश किया गया और बाद में संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास गया। लेकिन समिति के अध्यक्ष, वरिष्ठ भाजपा नेता श्री जगदम्बिका पाल, गृहमंत्रालय और दक्षिणपंथी हिंदुत्व शक्तियों के प्रवक्ता की तरह दिखाई दिए, जो हर तरह से मुस्लिम समुदाय और उनकी सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक संपत्तियों को नष्ट करने पर तुले थे। वक़्फ़ सुधारों को भी उन्होंने अपने विभाजनकारी एजेंडे का औज़ार बना लिया।

ऐसे हालात में अधिनियम की सबसे कठोर धाराओं पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और रोक लगाना समुदाय के लिए बड़ी राहत बनकर आया है। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह द्वारा दिए गए फ़ैसले में कुछ प्रावधानों को “प्रथमदृष्टया मनमाना” बताया गया और धारा 3C(2), धारा 3C(3) और धारा 3C(4) को रद्द कर दिया गया। इन धाराओं ने अधिकारियों को यह मनमाना अधिकार दे दिया था कि किसी वक़्फ़ संपत्ति को कोई सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण बताकर बिना किसी पूर्व सूचना और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर दिए, उसका वक़्फ़ दर्जा समाप्त कर सकें; सरकारी अधिकारी मामलों को अनिश्चित काल तक लटकाए रख सकें; तथा राजस्व अभिलेखों में बदलाव कर वक़्फ़ संपत्ति की स्थिति को एकतरफ़ा रूप से बदल सकें। न्यायालय ने सही रूप से माना कि ये बिल्कुल अन्यायपूर्ण और मनमानी व्यवस्थाएँ हैं।

लेकिन इतनी बड़ी क़ानूनी खामियों के बावजूद अदालत ने अधिनियम को पूरी तरह और स्पष्ट रूप से निरस्त करने से परहेज़ किया और इसके संचालन पर पूर्ण रोक नहीं लगाई। यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने संतुलन साधने का प्रयास किया और अधिनियम को क़ानून की पुस्तिका में बने रहने दिया तथा इसमें दर्ज कई अन्य धाराओं जैसे वक़्फ़ संपत्तियों के पंजीकरण की प्रक्रिया को मान्य कर दिया। अदालत का तर्क था कि वक़्फ़ अधिनियम में सुधार और संपत्तियों के सुचारु प्रबंधन की आवश्यकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि वक़्फ़ संपत्तियों का सही और कुशल प्रबंधन होना चाहिए और फैली हुई भ्रष्टाचार की गंदगी साफ़ की जानी चाहिए। वास्तव में मुस्लिम समुदाय के नेताओं और संगठनों ने भी इन संपत्तियों के प्रशासन में सुधार और दक्षता की ज़रूरत पर बार-बार ज़ोर दिया है। लेकिन इसके लिए ईमानदार और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण आवश्यक है। भाजपा सरकार और उसका गृहमंत्रालय इस क़ानून को जबरन संसद में अपने संख्यात्मक बहुमत के बल पर पारित कराकर अपनी नीयत और मनमानी उजागर कर चुके हैं। यह विधेयक कभी वैध नहीं था क्योंकि इसे समुदाय की सहमति के बिना उनकी संपत्तियों पर थोप दिया गया। इसलिए बेहतर होता कि सुप्रीम कोर्ट इसे पूरी तरह से रद्द कर देता और वक़्फ़ प्रशासन में सुधार के लिए एक अधिक संतुलित और सर्वसम्मत क़ानून का मार्ग प्रशस्त करता।

इलयास मोहम्मद थुम्बे
राष्ट्रीय महासचिव