लिंचिंग पर बांग्लादेश की कार्रवाई, मोदी सरकार की खामोशी

18 दिसंबर 2025 को मयमनसिंह में दीपु चंद्र दास की लिंचिंग के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार द्वारा उठाए गए कदम गंभीर ध्यान के योग्य हैं। अठारह संदिग्धों की गिरफ्तारी, 25 लाख बांग्लादेशी टका का मुआवजा और पीड़ित परिवार को आवास सहायता का आश्वासन यह दर्शाता है कि घटना के कई महीने बाद भी प्रशासनिक जवाबदेही संभव है।

इसके विपरीत, मोदी सरकार की निरंतर पाखंडपूर्ण राजनीति स्पष्ट दिखाई देती है। राजनीतिक संदेशों के लिए बांग्लादेश की घटनाओं का उल्लेख बार बार किया जाता है, जबकि हिंदुस्तान में बार बार होने वाली मॉब लिंचिंग पर व्यापक चुप्पी बनी रहती है। मुसलमानों, दलितों और अन्य कमजोर समुदायों को गौ सतर्कता, बच्चा चोरी की अफवाहों और पहचान आधारित घृणा से प्रेरित हिंसा का सामना करना पड़ता है, जिन पर अक्सर निर्णायक संस्थागत कार्रवाई के बजाय उदासीनता दिखाई देती है।

भारतीय न्याय संहिता मॉब लिंचिंग को हत्या मानते हुए आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान करती है, फिर भी कमजोर जांच, राजनीतिक संरक्षण और सुनियोजित कम रिपोर्टिंग के कारण सजा के मामले अत्यंत दुर्लभ बने हुए हैं। 2017 के बाद से राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा अलग से लिंचिंग के आंकड़े जारी न किए जाने से पारदर्शिता और जवाबदेही और सीमित हुई है। चयनात्मक नैतिकता हिंदुस्तान की मानवाधिकार विश्वसनीयता को कमजोर करती है और निष्पक्ष न्याय तथा समान संवैधानिक संरक्षण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।

दहलान बाक़वी
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष