
राजस्थान का दमनकारी धर्मांतरण विरोधी क़ानून असंवैधानिक और साम्प्रदायिक: एसडीपीआई
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया की राष्ट्रीय महासचिव यास्मीन फ़ारूक़ी ने राजस्थान विधानसभा में पारित राजस्थान अवैध धार्मिक रूपांतरण निषेध विधेयक, 2025 की कड़े शब्दों में निंदा की है। यह विधेयक 9 सितम्बर को विपक्ष के बहिष्कार और बिना किसी सार्थक बहस के जल्दबाज़ी में पारित कर दिया गया, जो संविधान, लोकतंत्र और देश की व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं पर अब तक के सबसे बड़े हमलों में से एक है।
नया क़ानून कथित धोखाधड़ीपूर्ण धर्मांतरण के मामलों में 7 से 14 साल की सज़ा और भारी जुर्माने का प्रावधान करता है। यदि धर्मांतरण महिला, नाबालिग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या दिव्यांग व्यक्ति से जुड़ा हो तो सज़ा 10 से 20 साल तक बढ़ा दी गई है। सामूहिक धर्मांतरण या कथित दबाव के मामलों में आजीवन कारावास और एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा यह क़ानून संगठनों का पंजीकरण रद्द करने और संपत्ति जब्त करने की शक्ति राज्य को देता है, जिससे सीधे तौर पर ग़रीब और वंचित तबकों की सेवा करने वाले एनजीओ, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और कल्याणकारी संस्थान निशाने पर आ जाते हैं।
एसडीपीआई का कहना है कि यह कानून असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह अस्पष्ट प्रावधानों के ज़रिये अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है, अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह वास्तविक धार्मिक संवाद को अपराध घोषित करता है, अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह व्यक्तियों को उनके निजी विश्वास सार्वजनिक करने के लिए मजबूर करता है, और अनुच्छेद 25 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचारित करने के अधिकार को सीमित करता है। धर्म परिवर्तन से पहले व्यक्ति को 90 दिन पूर्व और पुरोहित को दो महीने पूर्व ज़िला मजिस्ट्रेट को सूचना देने के लिए बाध्य करना निजी जीवन में दख़ल है, जिससे आस्था को निगरानी और भीड़ की जांच-पड़ताल का विषय बना दिया गया है।
इस क़ानून के पीछे की साम्प्रदायिक मंशा भाजपा की बयानबाज़ी से साफ़ झलकती है। राज्य के गृह मंत्री ने “लव जिहाद”, “विदेशी फंडिंग” और “जनसांख्यिकीय परिवर्तन” जैसी बेबुनियाद बातों का हवाला दिया, वहीं भाजपा विधायकों ने विपक्ष के मुस्लिम सदस्यों को “धर्मांतरित” कहकर उन्हें तथाकथित मूल धर्म में लौटने की नसीहत दी। ऐसे बयानों से स्पष्ट होता है कि इस क़ानून का मक़सद अधिकारों की रक्षा नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों को कलंकित करना है।
एसडीपीआई इस असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक क़ानून को तत्काल निरस्त करने की मांग करता है। पार्टी ने नागरिक समाज, विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों से अपील की है कि वे मिलकर हिंदुस्तान की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक परंपरा पर हुए इस ख़तरनाक हमले का विरोध करें।
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