
यासमीन फारूकी ने संविधान से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद हटाने के आरएसएस के प्रयास की कड़ी निंदा की
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय महासचिव यासमीन फारूकी ने आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले द्वारा हिंदुस्तान के संविधान की प्रस्तावना से “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द हटाने की मांग को कड़े शब्दों में नकारते हुए इसकी तीव्र आलोचना की है। यह कोई साधारण सुझाव नहीं है—यह हिंदुस्तानी लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों पर सीधा हमला है।
“समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द 1976 में 42वें संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़े गए थे ताकि हिंदुस्तान की सामाजिक न्याय, समानता और धार्मिक निरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट हो सके। ये शब्द केवल प्रतीकात्मक नहीं हैं—बल्कि हर नागरिक की गरिमा और समान अधिकारों की गारंटी देने वाले मौलिक सुरक्षा कवच हैं, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या वर्ग से हो। आरएसएस की यह मांग उसके बहुसंख्यकवादी एजेंडे को उजागर करती है, जो अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलती है और संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करती है।
एमर्जेन्सी का हवाला देकर इन मूल्यों को चुनौती देना भ्रामक है। सुप्रीम कोर्ट ने 1980 के मिनर्वा मिल्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले में इन संशोधनों को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना है। हमारे संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जो स्वतंत्रता, समानता और न्याय पर आधारित हो—न कि किसी एक समुदाय या विचारधारा के प्रभुत्व में चलने वाले राष्ट्र की। यह कहना कि हिंदुस्तान “स्वाभाविक रूप से” धर्मनिरपेक्ष है इसलिए इस शब्द की ज़रूरत नहीं, अत्यंत खतरनाक सोच है। संविधानिक सुरक्षा के बिना अल्पसंख्यक हमेशा असुरक्षित रहेंगे। 1949 में आरएसएस द्वारा संविधान का यह कहकर विरोध करना कि यह हिंदू सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित नहीं है, उसके हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ने की मंशा को उजागर करता है।
“समाजवादी” शब्द पर हमला भी उतना ही गंभीर है। जब देश में आर्थिक असमानता बढ़ रही है, ऐसे समय में समाजवाद को हटाना उन करोड़ों लोगों के अधिकारों पर चोट है जो जनकल्याण योजनाओं, सकारात्मक भेदभाव और पुनर्वितरण के न्याय पर निर्भर हैं। आरएसएस की विचारधारा केवल विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के हितों की रक्षा करती है, न कि हाशिए पर खड़े आम नागरिकों की।
एसडीपीआई सभी लोकतांत्रिक ताक़तों, नागरिक समाज और जागरूक नागरिकों से अपील करती है कि वे संविधान को कमजोर करने की इस खतरनाक साजिश का डटकर विरोध करें। यह सिर्फ दो शब्दों की बात नहीं है—यह हमारे गणराज्य की आत्मा और मूल भावना की रक्षा करने का प्रश्न है।
यासमीन फारूकी
राष्ट्रीय महासचिव
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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