भाषाई एकरूपता का विरोध: राजस्थान सरकार के विभाजनकारी आदेश के खिलाफ एसडीपीआई की कड़ी आपत्ति
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) की राष्ट्रीय महासचिव यास्मीन फारूक़ी ने राजस्थान सरकार के उस आदेश की तीव्र निंदा की है, जिसमें पुलिस दस्तावेज़ों में उर्दू और फ़ारसी शब्दों को हटाकर उनकी जगह हिंदी शब्दों के इस्तेमाल की बात कही गई है। सरकार का दावा है कि यह निर्णय प्रशासनिक सुगमता और न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए लिया गया है, लेकिन एसडीपीआई इसे एक छिपे हुए राजनीतिक एजेंडे के रूप में देखती है, जिसका उद्देश्य भारत की भाषायी और सांस्कृतिक विविधता को कमजोर करना है।
एसडीपीआई का मानना है कि भाषा को आसान बनाने के नाम पर लिया गया यह फैसला किसी ठोस शोध या आंकड़ों पर आधारित नहीं है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उर्दू या फ़ारसी शब्दों के कारण न्याय प्रक्रिया में देरी होती है। इसके विपरीत, अंग्रेज़ी और लैटिन के जटिल कानूनी शब्दों को अनदेखा कर केवल उर्दू और फ़ारसी को निशाना बनाना इस फैसले की असली मंशा को उजागर करता है।
राजस्थान सरकार के मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म द्वारा इन शब्दों के “मुगल कालीन” होने की बात कहना भी एक विशेष ऐतिहासिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, जो उर्दू भाषा को भारत की मूल पहचान से अलग और विदेशी बताने की कोशिश है — जबकि उर्दू न केवल भारत की मिट्टी में जन्मी है, बल्कि यह एक संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त भाषा भी है।
बीजेपी शासित राजस्थान सरकार का यह कदम छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसी अन्य बीजेपी शासित राज्यों की नीतियों से मेल खाता है, जहां “शुद्ध हिंदी” को बढ़ावा देने के नाम पर भाषायी विविधता को सीमित किया जा रहा है। इससे पहले भी राजस्थान सरकार ने उर्दू माध्यम स्कूलों को बंद करने और प्रशासनिक पदों के लिए उर्दू योग्यता को हटाने जैसे फैसले लिए हैं, जिससे उर्दू भाषी समुदाय विशेषकर मुसलमानों को सीधे नुकसान पहुँचा है। यह सांस्कृतिक विरासत को मिटाने का प्रयास है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2019 में एक संतुलित फैसला सुनाते हुए जहाँ कठिन उर्दू शब्दों से परहेज़ की बात कही थी, वहीं सरल उर्दू शब्दों के प्रयोग को स्वीकार किया था। लेकिन राजस्थान सरकार ने इस व्यावहारिक मार्ग को अपनाने की बजाय एकतरफा निर्णय लिया, जिसमें न तो भाषाविदों, न कानूनी विशेषज्ञों और न ही उर्दू भाषी समुदायों से कोई सलाह ली गई।
एसडीपीआई राजस्थान उर्दू टीचर्स एसोसिएशन और उन सभी संस्थाओं के साथ खड़ी है जिन्होंने इस आदेश को उर्दू की सांस्कृतिक हैसियत पर हमला बताया है। हम इस आदेश को तुरंत रद्द करने की मांग करते हैं और आग्रह करते हैं कि कानूनी शब्दावली में सुधार की प्रक्रिया पारदर्शी हो, जिसमें सभी भाषायी समुदायों को शामिल किया जाए। भारत की ताकत उसकी विविधता में है, और हम ऐसे किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देंगे जो किसी समुदाय की पहचान या योगदान को मिटाने की कोशिश करे।

No Comments