ब्रिटेन अपने हाथों पर लगे फ़िलिस्तीन के ख़ून के धब्बे नहीं धो सकता

ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने एक साथ जुड़ा हुआ क़दम उठाते हुए फ़िलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने और दो-राष्ट्र समाधान की बात कही है। इन देशों ने यह भी माना है कि इज़राइल की ओर से फ़िलिस्तीनियों पर जारी हिंसा ने उनकी पुरानी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। अब तक वे इज़राइल की नस्लवादी और साम्राज्यवादी नीतियों को आँख मूँदकर समर्थन देते रहे थे। यूरोप के कुछ और देश जैसे फ्रांस और पुर्तगाल ने भी अपनी पुरानी नीतियाँ बदलते हुए फ़िलिस्तीन को मान्यता देने की घोषणा की है। पहले ये देश अमेरिका के दबाव में हर बात में इज़राइल का साथ देते थे।

ब्रिटेन और उसके उपनिवेश रहे कनाडा व ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य यूरोपीय ताक़तें फ़िलिस्तीन के संकट के लिए अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकतीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब इज़राइल बनाया गया, उसी समय लाखों फ़िलिस्तीनियों को उनकी ज़मीनों से बेदख़ल करने और दुनिया भर से यहूदियों को वहाँ बसाने की साज़िश की अगुवाई ब्रिटेन ने ही की थी। 1917 में ब्रिटेन के विदेश मंत्री आर्थर बैलफ़ोर द्वारा किया गया “बैलफ़ोर डिक्लेरेशन” ज़ायोनिस्ट योजना का मुख्य आधार बना, जिसमें फ़िलिस्तीन में यहूदियों के लिए “राष्ट्रीय घर” बनाने का समर्थन किया गया था। यह घोषणा वास्तव में बैलफ़ोर द्वारा यहूदी मूल के ब्रिटिश बैंकर लॉर्ड रोथ्सचाइल्ड को लिखे गए पत्र में की गई थी, जो अरब जगत को बाँटने और वहाँ एक साम्राज्यवादी मोहरे के रूप में ज़ायोनिस्ट राज्य खड़ा करने की पूँजीवादी साज़िश थी।

इसके बाद से ही फ़िलिस्तीन और पूरे अरब जगत के लिए विनाश की शुरुआत हो गई। आज ज़्यादातर अरब देश अमेरिका के दबाव में हैं। उनके तेल जैसे प्राकृतिक संसाधनों को पश्चिमी ताक़तें नियंत्रित करती हैं और सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, बहरीन आदि देशों में अमेरिकी सैनिक ठिकाने मौजूद हैं। हक़ीक़त यह है कि इन देशों की संप्रभुता केवल दिखावा है, वे अमेरिका और उसके मोहरे इज़राइल के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सकते।

इन्हीं हालात में ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने अमेरिका की इज़राइल-समर्थक नीति से अलग रुख़ अपनाया है। इस पर इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इससे “इज़राइल के अस्तित्व को ख़तरा हो सकता है।” दिलचस्प बात यह है कि इज़राइल का सबसे दक्षिणपंथी नेता भी अब यह समझ रहा है कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून और मानवाधिकारों की परवाह किए बिना की गई उनकी बर्बर कार्रवाइयाँ अब उनके देश के लिए ख़तरा बन रही हैं। सच तो यह है कि इज़राइल धीरे-धीरे उसी तरह नफ़रत का प्रतीक बनता जा रहा है जैसे कभी रंगभेद-ग्रस्त दक्षिण अफ्रीका था, जिसे अंततः अपने पतन का सामना करना पड़ा।

यही सच्चाई है कि अन्याय और सैन्य ताक़त के सहारे कोई भी देश हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रह सकता। इज़राइल ने अपनी हद पार कर दी है और अब उसे इसके नतीजे भुगतने होंगे। लगता है कि अब वही पश्चिमी ताक़तें, जिन्होंने इज़राइल को जन्म दिया था, उनके भीतर ही दरारें पैदा हो रही हैं। उम्मीद की जा सकती है कि यह दरारें आगे चलकर और मज़बूत क़दम उठाने का कारण बनेंगी और फ़िलिस्तीन के निर्दोष लोगों पर जारी हिंसा का अंत होगा।

मोहम्मद इल्यास थुम्बे
महासचिव,

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया