बिहार में मतदाता सूची संशोधन पर विपक्ष की मांगों को खारिज करना लोकतंत्र के लिए गंभीर ख़तरा: एसडीपीआई

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मोहम्मद शफ़ी ने बिहार में विशेष सघन मतदाता सूची पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) को लेकर विपक्षी दलों द्वारा उठाई गई वैध मांगों को चुनाव आयोग द्वारा सिरे से खारिज किए जाने पर गहरी चिंता जताई है। आयोग का यह रवैया न केवल उसके संवैधानिक दायित्व का उल्लंघन है, बल्कि हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला है।

विपक्षी नेताओं ने आयोग से इस संशोधन प्रक्रिया को रोकने की मांग की थी, क्योंकि इसकी समयसीमा अव्यावहारिक है, दस्तावेज़ी शर्तें सख्त हैं, और इसके ज़रिए दो करोड़ से अधिक मतदाताओं—खासकर मुसलमानों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, प्रवासी मज़दूरों और ग़रीब तबकों—को मतदाता सूची से बाहर करने की आशंका है। लेकिन चुनाव आयोग ने इन चिंताओं को ईमानदारी से सुनने के बजाय झूठा दावा किया कि “सभी मुद्दों का समाधान किया जा चुका है”। इसके साथ ही आयोग द्वारा प्रतिनिधिमंडल के आकार पर मनमाना प्रतिबंध लगाना भी एक पारदर्शी संवाद की संभावना को कुचलने जैसा है।

2003 के बाद पंजीकृत मतदाताओं से जन्म प्रमाणपत्र की अनिवार्यता—a एक ऐसा दस्तावेज़ जो खुद आयोग के आंकड़ों के अनुसार हिंदुस्तान के बिहार जैसे राज्य में सिर्फ़ 75% जन्मों के लिए ही उपलब्ध होता है—करोड़ों लोगों को मताधिकार से वंचित करने की दिशा में उठाया गया कदम है। आठ करोड़ मतदाताओं की जांच की समयसीमा 25 जुलाई, 2025 तक तय करना न केवल अव्यावहारिक है बल्कि बिहार विधानसभा चुनावों (नवंबर में प्रस्तावित) को देखते हुए अत्यंत संदिग्ध भी है।

चुनाव आयोग भले ही यह दावा करे कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुरूप है, लेकिन इसका ज़मीनी क्रियान्वयन सीधे-सीधे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को निशाना बनाता है। आधार कार्ड या वोटर आईडी जैसे वैकल्पिक दस्तावेजों को मान्यता न देना, स्वतंत्र निगरानी की व्यवस्था न होना और सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण न देना—इन सबके कारण यह प्रक्रिया राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) जैसे बहिष्कारी उपक्रमों की याद दिलाती है।

एसडीपीआई मांग करती है कि इस विशेष सघन पुनरीक्षण प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोका जाए, समयसीमा को निष्पक्ष और व्यावहारिक बनाया जाए, वैकल्पिक दस्तावेजों को मान्यता दी जाए, मतदाता सूची में बदलावों की स्वतंत्र ऑडिट करवाई जाए और राजनीतिक संवाद पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं। हम बिहार की जनता और पूरे हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक ताक़तों से अपील करते हैं कि वे मताधिकार पर हो रहे इस हमले का डटकर मुकाबला करें।