
धांधली और वोट चोरी पर जवाबदेही से नहीं बच सकता चुनाव आयोग
हिंदुस्तान का चुनाव आयोग इस समय गंभीर जन-आलोचना का सामना कर रहा है। आरोप है कि उसने न केवल 2024 के लोकसभा चुनाव और कुछ विधानसभा चुनावों में सत्ताधारी दल को कथित तौर पर वोट चोरी में मदद की, बल्कि बिहार जैसे राज्यों में विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान जल्दबाज़ी में की गई कार्रवाइयों में कई खामियां छोड़ दीं, जिनसे बड़ी संख्या में नागरिक मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
विपक्षी दल अब बड़े पैमाने पर आंदोलनों के जरिए सड़कों पर उतर आए हैं, यह मांग करते हुए कि चुनाव आयोग पिछले लोकसभा चुनाव में हुई कथित वोट चोरी की घटनाओं की जांच करे और बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण के कारण हुई समस्याओं को ठीक करे, जिसमें 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। चुनावी धांधली के खिलाफ जनता का आंदोलन तेज़ और मजबूत होता दिख रहा है, क्योंकि अधिक से अधिक राजनीतिक दल आवाज उठा रहे हैं और चुनावों के संचालन में पूर्व में हुई गड़बड़ियों के नए आरोप सामने आ रहे हैं।
स्थिति और जटिल हो गई है क्योंकि संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग निष्पक्ष तरीके से आलोचनाओं को संबोधित करने से इंकार कर रहा है, वहीं सत्ताधारी भाजपा ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की है, बजाय इसके कि कानून को अपना काम करने दे। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ भाजपा नेता चुनाव आयोग के प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे हैं।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा तथ्यों और आंकड़ों के साथ लगाए गए आरोपों पर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया विश्वसनीय नहीं मानी जा रही है। श्री गांधी ने चुनाव आयोग के ही दस्तावेजों पर आधारित गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा खंड में मतदाता सूची की गहन जांच के आधार पर अनियमितताओं को उजागर किया है। उन्होंने सूची में पांच बड़े मुद्दों की ओर इशारा किया—बड़ी संख्या में डुप्लीकेट वोटर, फर्जी और अवैध पते, एक ही पते पर भारी संख्या में वोटर, अवैध फोटो, और नए वोटर पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 का दुरुपयोग।
इन आरोपों के कई दिनों से सार्वजनिक दायरे में होने और पूरे देश में बड़े जन-आंदोलनों का विषय बनने के बावजूद, चुनाव आयोग ने न तो राजनीतिक दलों से संवाद किया और न ही निष्पक्ष जांच शुरू की। जनविश्वास बहाल करने के बजाय आयोग का यह कहना कि अगर विपक्षी नेता को शिकायत है तो वह “हलफनामे के तहत” दर्ज कराएं—हास्यास्पद है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय भी तब स्वतः संज्ञान लेता है जब हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में जनता का विश्वास दांव पर हो।
लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही लोकतंत्र को तानाशाही और निरंकुश शासन से अलग करता है। लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि होती है और यह इच्छा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के माध्यम से व्यक्त होती है। इसलिए, चुनावी प्रणाली और उसे संचालित करने वाली संस्था की विश्वसनीयता बनाए रखना अत्यावश्यक है। दुर्भाग्यवश, चुनाव आयोग ने सीधे मुद्दों का समाधान करने के बजाय तकनीकी बहानों में शरण लेकर अपनी ही साख और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को कमजोर किया है। यह न केवल संस्था बल्कि दीर्घकाल में हिंदुस्तानी लोकतंत्र के लिए भी हानिकारक होगा।
इसलिए, चुनाव आयोग का अपने निष्क्रिय रुख से बाहर आना और सभी मामलों की सख्त व सावधानीपूर्वक जांच कर कठोर कार्रवाई करना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसे मामले दोबारा न हों। साथ ही, यह समय है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की गंभीर समीक्षा हो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में व्यापक सुधार किए जाएं। सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया था कि हिंदुस्तान के मुख्य न्यायाधीश को भी चुनाव आयुक्त चयन समिति में शामिल किया जाए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। अब यह स्पष्ट हो गया है कि उन्होंने स्वतंत्र न्यायिक प्राधिकरण को इसमें शामिल क्यों नहीं किया—क्योंकि आज हम देख रहे हैं कि चुनाव आयोग एक निष्पक्ष संवैधानिक संस्था न रहकर सत्तारूढ़ दल और उसकी सरकार का अंग बनकर रह गया है।
एडवोकेट शरफुद्दीन अहमद
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
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