केरल में चर्च को रिझाने, छत्तीसगढ़ में ननों की गिरफ्तारी: एसडीपीआई ने की तत्काल रिहाई की मांग

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एडवोकेट शरफुद्दीन अहमद ने 25 जुलाई 2025 को छत्तीसगढ़ में सिस्टर प्रीति मैरी, वंदना फ्रांसिस और आदिवासी युवती सुखमन मंडावी की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की है। मानव तस्करी और जबरन धर्मांतरण के आरोप निराधार हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि यह ईसाइयों को डराने और उन्हें अपराधी ठहराने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। यह हिंदुस्तान के संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता की सीधी अवहेलना है और भाजपा की अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ती शत्रुता को उजागर करता है।

यह गिरफ्तारी, जो कथित रूप से बजरंग दल की शिकायत के आधार पर की गई, किसी भी विश्वसनीय साक्ष्य पर आधारित नहीं है। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, ननें कुछ आदिवासी लड़कियों को रोजगार से संबंधित यात्रा में सहायता कर रही थीं—जो न केवल कानूनी कार्य था, बल्कि मानवीय भी। लेकिन इस क्रियाकलाप को दुर्भावनापूर्ण तरीके से आपराधिक मामला बना दिया गया। भाजपा-शासित राज्यों जैसे छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और मणिपुर में, ऐसे कानूनों का दुरुपयोग आम हो गया है, जहाँ हिंदुत्व के स्वयंभू रक्षक प्रशासनिक चुप्पी या मिलीभगत के चलते बेखौफ होकर काम कर रहे हैं।

अल्पसंख्यकों को लेकर भाजपा का दोहरा रवैया स्पष्ट है। केरल में वह ईसाई वोट बैंक को लुभाने का प्रयास कर रही है—त्रिशूर सीट जीतना और मुनंबम भूमि विवाद पर समझौतावादी संकेत देना इसका उदाहरण है। वहीं छत्तीसगढ़ में ननों की गिरफ्तारी को जायज़ ठहराया जा रहा है और आरएसएस व वीएचपी की विभाजनकारी भाषा दोहराई जा रही है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा गिरफ्तारी का बचाव यह दर्शाता है कि राज्य सरकार और संघ परिवार के बीच वैचारिक गठजोड़ है। वहीं वीएचपी का समर्थन इस कार्रवाई के सांप्रदायिक उद्देश्यों को पूरी तरह उजागर करता है।

इस दमन के सामने कैथोलिक चर्च की चुप्पी अत्यंत चिंताजनक है। वक्फ संशोधन विधेयक जैसे मुद्दों पर भाजपा से संवाद करने के बावजूद, अन्य राज्यों में ईसाइयों पर हो रहे हमलों के खिलाफ उसकी चुप्पी हिंदुत्व राजनीति के विरुद्ध प्रतिरोध को कमजोर करती है और धर्मनिरपेक्षता व अल्पसंख्यक अधिकारों की व्यापक लड़ाई को भी क्षति पहुँचाती है।

एसडीपीआई मांग करती है कि गिरफ्तार व्यक्तियों को अविलंब रिहा किया जाए और झूठे प्राथमिकी को रद्द किया जाए। इस मामले में बजरंग दल की भूमिका और गिरफ्तारी की वैधता की न्यायिक जांच की जाए। इसके अतिरिक्त, यह आवश्यक है कि धर्मांतरण विरोधी कानूनों के दुरुपयोग को रोकने हेतु त्वरित कानूनी सुधार किए जाएँ।