
एसडीपीआई ने सोनम वांगचुक की रिहाई की माँग की, एनएसए के तहत अवैध गिरफ़्तारी की कड़ी निंदा
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मोहम्मद शफ़ी ने विख्यात जलवायु कार्यकर्ता और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्तकर्ता सोनम वांगचुक की लेह, लद्दाख में कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत की गई मनमानी गिरफ़्तारी की कड़े शब्दों में निंदा की है। यह हिरासत संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों—विशेषकर शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19 और 21) का खुला उल्लंघन है।
ग़ैर-हिंसा और पर्यावरण न्याय के आजीवन पक्षधर वांगचुक को 26 सितम्बर, 2025 को उस समय गिरफ़्तार किया गया जब लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के प्रावधानों की माँग कर रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान झड़पें हुईं। केंद्र सरकार ने पिछले छह वर्षों से इन जायज़ माँगों की लगातार अनदेखी की है, जिससे क्षेत्र में असंतोष और अशांति गहराती गई है।
भाजपा शासन लद्दाख में शांति बहाल करने में विफल रहा है और लोकतांत्रिक संवाद की बजाय तानाशाही अहंकार से प्रतिक्रिया दे रहा है। 24 सितम्बर को लेह में हुए प्रदर्शनों में चार नागरिकों की मौत और 90 से अधिक लोगों के घायल होने की घटनाएँ सीधी तौर पर सरकारी उपेक्षा और कठोर दमनकारी नीतियों का परिणाम थीं। समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रशासन ने कर्फ़्यू लगाया, इंटरनेट सेवाएँ बंद कीं और एनएसए—जो बिना मुक़दमे के 12 महीने तक हिरासत की अनुमति देता है—का दुरुपयोग कर वांगचुक जैसे शांतिप्रिय कार्यकर्ता को निशाना बनाया।
2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के समय किए गए वादों को पूरा न करना सरकार की लद्दाख से गद्दारी को और स्पष्ट करता है। राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल कर जनजातीय भूमि व संस्कृति की रक्षा, स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों का आरक्षण और नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा—ये सभी वादे अधूरे हैं। इसके चलते गहरी निराशा, युवाओं में 40 प्रतिशत से अधिक बेरोज़गारी और अंधाधुंध खनन व पर्यटन से पर्यावरण विनाश का भय बढ़ा है। रचनात्मक संवाद के बजाय सत्ता पक्ष लद्दाखियों की ज़िंदगी से राजनीतिक खेल खेल रहा है, ठीक उसी तरह जैसे मणिपुर और कश्मीर में किया गया, जहाँ केंद्र शासित व्यवस्था ने जातीय हिंसा और मानवाधिकार हनन को जन्म दिया।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी मोदी सरकार के तहत भारत में सिमटती नागरिक स्वतंत्रताओं पर चिंता जताई है। 25 सितम्बर को वांगचुक की संस्था सेकमोल का एफसीआरए लाइसेंस तथाकथित धन के दुरुपयोग के आरोप में रद्द किया जाना, उनके काम को आर्थिक रूप से पंगु बनाने और असहमति की आवाज़ दबाने का सुनियोजित प्रयास है।
एसडीपीआई सोनम वांगचुक और सभी गिरफ़्तार प्रदर्शनकारियों की तत्काल रिहाई की माँग करता है। सरकार को लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस से सार्थक संवाद शुरू कर लद्दाख की लंबित माँगों को तुरंत पूरा करना चाहिए। लगातार दमन इस रणनीतिक रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में अलगाव को और गहरा करेगा, हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक मूल्यों को कमज़ोर करेगा और बाहरी ख़तरों को बढ़ावा देगा।
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