एम के फैज़ी ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों से संबंधित नए दिशानिर्देशों को रद्द करने की मांग की

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष एम के फैज़ी ने केंद्र सरकार के हालिया प्रशासनिक फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग की है, जिसके तहत प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान या भारत आने वाले विदेशी नेताओं की यात्राओं के समय किए जाने वाले कुछ अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों के लिए पहले से मंत्रिमंडल की स्वीकृति लेने की अनिवार्यता को हटा दिया गया है। बताया जाता है कि यह निर्देश 18 फरवरी को मंत्रिमंडल सचिवालय द्वारा बिना किसी सार्वजनिक घोषणा या संसदीय चर्चा के जारी किया गया। इस कदम ने भारत की विदेश नीति के संचालन में पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं।

संशोधित दिशानिर्देशों के अनुसार, समझौता ज्ञापन और संयुक्त आशय घोषणाओं सहित कई प्रकार के अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज अब केंद्रीय मंत्रिमंडल के पूर्व विचार के बिना ही किए जा सकते हैं। इसके बजाय ऐसे दस्तावेज विदेश मंत्रालय के विधि और संधि प्रभाग की मंजूरी के बाद आगे बढ़ सकते हैं, बशर्ते उनमें कोई प्रत्यक्ष वित्तीय दायित्व न हो और उनके शीर्षक में संधि, कन्वेंशन या एग्रीमेंट जैसे औपचारिक शब्दों का प्रयोग न किया गया हो। इन दस्तावेजों पर उच्च स्तरीय कूटनीतिक बैठकों के दौरान हस्ताक्षर किए जा सकते हैं, जबकि मंत्रिमंडल को केवल समय समय पर जानकारी के लिए रिपोर्ट दी जाएगी, न कि विचार विमर्श या स्वीकृति के लिए। फैज़ी ने चेतावनी दी कि यह परिवर्तन मंत्रिमंडलीय व्यवस्था के उस सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को कमजोर करता है, जो 1961 के ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस नियमों में भी परिलक्षित होता है।

पार्टी ने बिना सार्वजनिक चर्चा या संसदीय जांच के इतने महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक बदलाव लाने के उद्देश्य पर भी सवाल उठाया है। फैज़ी ने कहा कि इस कदम से यह आशंका पैदा होती है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय समझों को व्यापक सरकारी निगरानी से, यहाँ तक कि मंत्रिमंडल के सदस्यों की जांच से भी दूर रखा जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि स्थापित नियंत्रण व्यवस्थाओं को कमजोर करने से ऐसे निर्णयों का रास्ता खुल सकता है जो लोकतांत्रिक जवाबदेही से बच निकलें। ऐसे समय में जब सरकार पर बड़े कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं, इस प्रकार की छूट यह संदेह और गहरा कर सकती है कि इन व्यवस्थाओं से आखिर किसके हित साधे जा रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली सभी पहल पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए तथा उन्हें केवल राष्ट्रीय हित के आधार पर ही संचालित किया जाना चाहिए, न कि चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों की प्राथमिकताओं के अनुसार।