
इतिहास की पुनर्रचना के बहाने, भविष्य में ज़हर घोलने की कोशिश: एनसीईआरटी पर इलियास थुम्बे का करारा प्रहार
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव इलियास मुहम्मद थुम्बे ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक Exploring Society: India and Beyond – Part 1 में किए गए संशोधन की कड़ी निंदा की है, जो 2025–26 शैक्षणिक वर्ष के लिए लागू की गई है। बाबर, अकबर और औरंगज़ेब जैसे मुगल सम्राटों को केवल “लुटेरे” के रूप में चित्रित करना, जबकि उनके योगदान को पूरी तरह से नजरअंदाज़ करना, भारत के समृद्ध और बहुलतावादी इतिहास की एक सुनियोजित विकृति है।
ये बदलाव स्पष्ट रूप से राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित प्रतीत होते हैं, जिनका मकसद एक खास हिन्दू राष्ट्रवादी नैरेटिव को बढ़ावा देना है और मुग़लों की सांस्कृतिक व प्रशासनिक विरासत में उनकी भूमिका को कम करके आंकना है। यह कदम सत्तारूढ़ शासन की वैचारिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है और विद्यार्थियों के मन में साम्प्रदायिक विभाजन की ज़हरीली नींव डालने का कार्य करता है। मुग़लों को “विदेशी आक्रमणकारी” बताना, जबकि वे हिंदुस्तान की मिट्टी से जुड़े हुए थे, इतिहास को खतरनाक रूप से तोड़ने-मरोड़ने का प्रयास है।
मुग़ल बाहरी नहीं थे। वे यहीं पैदा हुए, यहीं दफन हुए, और हमारी सभ्यता के विकास में उन्होंने एक आधारभूत भूमिका निभाई। उनके प्रशासनिक सुधार, कला के क्षेत्र में उपलब्धियाँ, और धार्मिक सहिष्णुता की नीति ने हिंदुस्तानी समाज पर अमिट छाप छोड़ी है। ताजमहल और लालकिला जैसे स्मारक उनकी स्थापत्य प्रतिभा और सांस्कृतिक समन्वय की गवाही देते हैं। ‘मंदिर विध्वंस’ पर दिया गया पाठ्यपुस्तक का झूठा नैरेटिव धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देता है और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की अनदेखी करता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की आड़ में किया गया यह संशोधन शिक्षा के भगवाकरण की एक व्यापक साजिश का हिस्सा लगता है, जो ऐतिहासिक तथ्यों के बजाय वैचारिक एकरूपता को थोपने का प्रयास है। यह हमारे संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना का सीधा उल्लंघन है, जिसकी रक्षा के लिए एसडीपीआई पूरी प्रतिबद्धता के साथ खड़ी है। शिक्षा का उद्देश्य चेतना और एकता होना चाहिए, न कि ब्रेनवॉश और विभाजन।
हम मांग करते हैं कि एनसीईआरटी तत्काल इस पाठ्यपुस्तक को संशोधित करे और मुग़ल काल का निष्पक्ष एवं समग्र चित्रण प्रस्तुत करे — जिसमें उनके योगदानों और जटिलताओं दोनों को जगह मिले। इतिहासकारों, शिक्षाविदों और समुदाय के प्रतिनिधियों को शामिल कर एक पारदर्शी समीक्षा प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए ताकि हमारी पाठ्यपुस्तकें भारत की असली विविधता को प्रतिबिंबित करें।
एसडीपीआई इस इतिहास विकृति के विरुद्ध जन-जागरूकता अभियान चलाएगी और हमारे शिक्षा तंत्र की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए कानूनी विकल्पों पर भी विचार क
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