
इज़राइली राजदूत के दुर्व्यवहार पर कार्रवाई होनी चाहिए
लोकसभा सदस्य श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा गाज़ा में फ़िलिस्तीनी जनता पर इज़राइल के हमलों की सार्वजनिक आलोचना पर हिंदुस्तान में इज़राइल के राजदूत की अत्यंत असंयमित टिप्पणी, हिंदुस्तान की लोकतांत्रिक राजनीतिक परंपराओं पर इज़राइली अधिकारियों का एक खुला हमला है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
श्रीमती प्रियंका गांधी ने जब ट्वीट किया कि “इज़राइली राज्य गाज़ा में नरसंहार कर रहा है”, तो वह केवल वही राय व्यक्त कर रही थीं जो लगभग पूरे वैश्विक जनमत की साझा राय है। यहां तक कि इज़राइल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद ओलमर्ट और वहां के अनेक वरिष्ठ राजनेता भी इसी तरह की बातें कह चुके हैं और पिछले दो वर्षों में निहत्थे फ़िलिस्तीनी जनता पर मानवाधिकार उल्लंघन और नरसंहारात्मक युद्ध छेड़ने के लिए मौजूदा सरकार की आलोचना कर चुके हैं। हिंदुस्तान का इतिहास हमेशा न्यायपूर्ण कारणों का समर्थन करने और विश्व के किसी भी हिस्से में होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाने का रहा है। इस नाते हिंदुस्तान को गाज़ा की मौजूदा स्थिति पर अपनी चिंता जाहिर करने और वहां के लोगों के साथ खड़े होने का अधिकार है।
लेकिन इज़राइली राजदूत रूवेन अज़ार ने सभी कूटनीतिक शिष्टाचार और परंपराओं की अनदेखी करते हुए हिंदुस्तान की संसद की वरिष्ठ विपक्षी सदस्य से सार्वजनिक रूप से उलझना चुना। राजदूतों का यह कर्तव्य होता है कि वे अपने मेज़बान देश के आंतरिक मामलों में दखल न दें। श्रीमती गांधी की आलोचना जितनी इज़राइली सत्ता पर थी, उतनी ही हिंदुस्तान की सत्ताधारी ताक़तों पर भी थी, जिन्होंने हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इन हमलों की स्पष्ट निंदा करने से परहेज़ किया है। इसके बावजूद इज़राइली राजदूत ने श्रीमती गांधी को निशाना बनाते हुए उन पर “शर्मनाक धोखे” का आरोप लगाया। उनका दावा है कि गाज़ा में मारे गए सभी लोग “हमास आतंकवादी” थे, जो लोगों के बीच छिपकर उन्हें गोली मार रहे थे और सहायता प्राप्त करने वालों को रोक रहे थे। उन्होंने यहां तक कह डाला कि इज़राइल ने गाज़ा में दो मिलियन टन खाद्य सामग्री भेजी और वहां कोई नरसंहार नहीं हुआ।
राजदूत के ये झूठे दावे हास्यास्पद हैं और पूरी दुनिया के सामने गाज़ा में घटित हो रहे भयानक घटनाक्रमों को देखते हुए निंदनीय भी। इज़राइल को न तो मानवाधिकारों की परवाह है, न ही अंतरराष्ट्रीय जनमत की। गाज़ा में उनके कृत्य युद्ध अपराध हैं और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने इन्हें अंतरराष्ट्रीय क़ानून के गंभीर उल्लंघन के रूप में दर्ज किया है। यह केवल समय की बात है जब इन युद्ध अपराधियों, जिनमें प्रधानमंत्री नेतन्याहू भी शामिल हैं, को मानवता के खिलाफ अपने घोर अपराधों के लिए न्याय के कटघरे में खड़ा किया जाएगा।
ऐसे हालात में हिंदुस्तान सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और इज़राइल सरकार से अपने राजदूत के इस उकसाने वाले व्यवहार पर कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहिए। नरेंद्र मोदी सरकार को समझना होगा कि हिंदुस्तान के घरेलू मामलों में विदेशी ताक़तों का हस्तक्षेप गंभीर चिंता का विषय है और यदि इसे अनियंत्रित रूप से जारी रहने दिया गया तो यह वैश्विक मंच पर देश के लिए बड़ी शर्मिंदगी साबित होगा। इसलिए विदेश मंत्रालय (MEA) के लिए ज़रूरी है कि वह इन भड़काऊ टिप्पणियों पर आधिकारिक रूप से अपनी असहमति और आपत्ति दर्ज कराए।
इलियास मुहम्मद थुम्बे
राष्ट्रीय महासचिव
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया
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