अडानी को 9,000 बीघा, हज़ारों बेघर – असम सरकार पर मोहम्मद शफ़ी का प्रहार

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मोहम्मद शफ़ी ने असम की भाजपा सरकार के उस बेहिचक फ़ैसले की कड़ी निंदा की है, जिसके तहत साधारण नागरिकों की ज़िंदगियों, घरों और अधिकारों की कीमत पर अडानी समूह को विशाल भूभाग सौंप दिया गया है। यह कृत्य शासन के असली चेहरे को उजागर करता है—जहाँ कॉर्पोरेट मुनाफ़ाख़ोरी को संवैधानिक संरक्षण, आदिवासी अधिकारों और वंचित समुदायों की भलाई से ऊपर रखा गया है।

साल 2021 से हिमंत विश्व शर्मा सरकार ने अभूतपूर्व बेदख़ली अभियान छेड़ा है, जिसमें 50,000 से अधिक परिवारों को उजाड़ा गया और 1.19 लाख बीघा सरकारी ज़मीन तथा 84,000 बीघा वन भूमि पर क़ब्ज़ा कर लिया गया। बेदख़ल किए गए लोगों की भारी बहुसंख्या ग़रीब बंगाली मूल के मुसलमानों, आदिवासियों, कर्बी, डिमासा, नागा और अन्य हाशिये पर मौजूद समुदायों की है। इन परिवारों को “क़ब्ज़ाधारी” कहकर बेरहमी से उजाड़ा जाता है, जबकि वही ज़मीनें अडानी, रिलायंस और पतंजलि जैसी कॉर्पोरेट कंपनियों को बेझिझक सौंप दी जाती हैं।

सबसे चौंकाने वाली मिसाल दीमा हसाओ की है, जहाँ एशिया की सबसे बड़ी बताई जा रही अडानी सीमेंट फैक्ट्री के लिए क़रीब 9,000 बीघा ज़मीन आवंटित की गई। यह छठी अनुसूची में आदिवासी भूमि को मिले संरक्षण का खुला उल्लंघन है और क़रीब 14,000 मूलनिवासी परिवारों के विस्थापन का ख़तरा खड़ा करता है। यहाँ तक कि गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी सरकार के इस लापरवाह सौदे पर हैरानी जताई और सवाल किया कि क्या पूरा ज़िला ही एक कॉर्पोरेट घराने को सौंपा जा रहा है? इसी तरह धुबरी में अडानी थर्मल प्लांट परियोजना के लिए 3,500 बीघा ज़मीन खाली कराने हेतु क़रीब 2,000 मुस्लिम परिवारों को उजाड़ा गया। यह फ़ैसले विकास नहीं, बल्कि जनता की ज़मीन की दिन-दहाड़े लूट हैं।

एसडीपीआई दोहराती है कि असली विकास बेदख़ल किए गए नागरिकों की लाशों पर खड़ा नहीं किया जा सकता। पुनर्वास के बिना, सहमति के बिना और वनाधिकार क़ानून व अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक संरक्षण की अवहेलना करते हुए की गई बेदख़लियाँ केवल अमानवीय ही नहीं, बल्कि आपराधिक भी हैं। आदिवासी अधिकारों की रक्षा का सरकार का दावा महज़ एक ख़तरनाक दिखावा है, जबकि असलियत में वह असम के संसाधनों की कॉर्पोरेट उपनिवेशीकरण की राह खोल रही है।

हम चेतावनी देते हैं कि भाजपा सरकार और अडानी का यह गठजोड़ असम में और अधिक अशांति, ध्रुवीकरण और पर्यावरणीय विनाश को जन्म देगा। एसडीपीआई मांग करती है कि सभी कॉर्पोरेट भू-आवंटनों पर तत्काल रोक लगाई जाए, ग़ैरक़ानूनी हस्तांतरणों की स्वतंत्र जाँच हो और बेदख़ल किए गए परिवारों के लिए ठोस पुनर्वास योजना बनाई जाए। असम की ज़मीन उसके लोगों की है—न कि अडानी की, और न ही उन लोगों की जो राज्य का भविष्य राजनीतिक और आर्थिक फ़ायदे के लिए बेच रहे हैं।